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Tuesday, March 23, 2010

वन विहार को मिला आईएसओ अवार्ड

 बैटरी चलित वाहन एवं साईकिलों का लोकार्पण
वन विहार राष्ट्रीय उद्यान को आज प्रतिष्ठित आईएसओ 9001:2008 अवार्ड प्रमाण पत्र मिला। वन मंत्री श्री सरताज सिंह ने श्योरविन क्वालिटी सर्टिफिकेशन संस्था से वन विहार में आज आयोजित एक कार्यक्रम में प्रमाण पत्र प्राप्त किया। वन एवं राजस्व राज्य मंत्री श्री जय सिंह मरावी भी इस अवसर पर उपस्थित थे।

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Saturday, March 20, 2010

पर्यावरण संतुलन के लिये वन संरक्षण जरूरी - वन मंत्री

 विश्व वानिकी दिवस
वन मंत्री श्री सरताज सिंह ने विश्व वानिकी दिवस के अवसर पर अपने संदेश में कहा है कि विश्व में हरे आवरण की लगातार कमी के कारण पर्यावरण को खतरा उत्पन्न हो गया है। पर्यावरण संतुलन बनाये रखने के लिये वनों का संरक्षण एक विकास ही एक मात्र विकल्प है।

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Wednesday, February 24, 2010

छापामार कार्यवाही की पाक्षिक समीक्षा हो - वन मंत्र

 वन अपराधों की रोकथाम के सिलसिले में
वन मंत्री श्री सरताज सिंह ने निर्देश दिये हैं कि वन विभाग द्वारा वन अपराधों की रोकथाम के लिये विभिन्न स्तरों पर की जा रही छापामार कार्यवाही की समीक्षा हर 15 दिन में की जाये।
वन मंत्री ने कहा है कि प्रदेश एवं संभाग स्तर पर गठित उड़नदस्ता के माध्यम से छापामार कार्यवाही की जा रही है और इस संबंध में शासन द्वारा जारी निर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाये। वन मण्डल स्तर से मुख्यालय को प्रतिदिन की कार्यवाही की जानकारी मिलने की व्यवस्था सुनिश्चित हो। प्राप्त जानकारी एवं शिकायतों की हर 15 दिन में मुख्यालय पर समीक्षा हो।

वन मंत्री ने कहा है कि पाक्षिक समीक्षा बैठक में उनके विशेष कर्त्तव्य अधिकारी भी उनकी ओर से उपस्थित होंगे।

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Thursday, December 17, 2009

वन संरक्षण की प्राथमिकताएं पुन: तय करें - वन मंत्री श्री सरताज सिंह

 ग्रामवासी वनों के नुकसान के प्रति सजग हों
वन मंत्री श्री सरताज सिंह ने कहा कि वनों के संवर्धन एवं संरक्षण के साथ ही बिगड़े वनों की पुर्नस्थापना की प्राथमिकताएं और अधिक सुधार के साथ पुन: तय की जायें। वन मंत्री गत दिवस एक बैठक में वन संरक्षण से सम्बन्धित कार्यों की समीक्षा कर रहे थे। उन्होंने कहा कि वनों को क्षति जलाऊ लकड़ी काटने और पशु चराने के कारण होती है। इससे कैसे बचा जाये, यह प्राथमिकता में होना चाहिये।
श्री सरताज सिंह ने कहा कि प्राथमिकता यह होनी चाहिये कि वन क्षेत्रों के समीपस्थ ग्रामों में वे सभी संसाधन उपलब्ध कराये जायें जिनसे वनों पर निर्भरता कम हो और ग्रामवासी वनों के नुकसान के प्रति सजग हों। अभी वनों को जो नुकसान हो चुका है, उसकी पूर्ति किस प्रकार से जल्दी की जाये, इसे ओर गम्भीरता से विचार कर कार्य करना हमारी प्राथमिकता में शामिल हो।
बैठक में बताया गया कि विभागीय कार्य आयोजना के अनुरूप प्रदेश में प्रतिवर्ष औसतन डेढ़ लाख हैक्टेयर बिगड़े वन क्षेत्रों का नियमित उपचार किया जा रहा है। राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम के तहत प्रतिवर्ष औसतन 13 हजार हैक्टेयर में रोपण किया जा रहा है।
विभाग की अनुसंधान एवं विस्तार वृत्त इकाईयों के माध्यम से गैर वन क्षेत्रों में वृक्षारोपण बढ़ाने के प्रयास किये जा रहे है। राज्य वन विकास निगम द्वारा पिछले तीन दशकों में 3 लाख 20 हजार हैक्टेयर वन क्षेत्र में रोपण किया गया है। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारन्टी योजना के तहत पिछले वर्षों में लगभग 34 हजार हैक्टेयर में रोपण किया गया है। बारहवें वित्त आयोग के तहत पिछले पांच वर्षों में प्रदेश के 11 हजार 400 हैक्टेयर वृक्षविहीन क्षेत्रों को हरा-भरा करने के लिये वृक्षारोपण किया गया है।
बैठक में बताया गया कि वनों पर दबाव कम करने के लिये अन्य विभागों द्वारा कार्यवाही की आवश्यकता है। मुख्य रूप से ग्रामीण विकास विभाग द्वारा वनों से लगे ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका विकास, पशुपालन विभाग द्वारा पशुनस्ल सुधार, कृषि विभाग द्वारा बारानी खेती क्षेत्रों की उत्पादकता में वृद्धि तथा ऊर्जा विकास निगम द्वारा वैकल्पिक ऊर्जा स्त्रोतों को बढ़ावा एवं ऊर्जा बचत के लिये उन्नत चूल्हा, बायोगैस, सोलर कुकर आदि का उपयोग प्राथमिकता से बढ़ाने की आवश्यकता है।
बैठक में बताया गया कि इसके साथ ही विभाग द्वारा विस्तार के माध्यम से जलाऊ लकड़ी, बल्ली एवं बांस प्रदाय की सुविधा ग्रामीणों को दी गई है। वन संरक्षण एवं संवर्धन तथा सुरक्षा के कार्यों में जनभागीदारी के लिये 15 हजार 228 वन समितियों का सहयोग लिया जा रहा है। लोक वानिकी के अन्तर्गत निजी वन क्षेत्रों के वैज्ञानिक प्रबंधन को बढ़ावा दिया जा रहा है।
निजी भूमि पर वृक्षों के काटने एव परिवहन के नियमों का सरलीकरण किया गया है। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारन्टी योजना में वर्ष 2009-10 के लिये 631 करोड़ रूपये के प्रस्ताव दिये गये है। वन विकास अभिकरणों के माध्यम से भारत सरकार से वित्तीय संसाधन प्राप्त करने हेतु प्रस्ताव दिये गये है। तेरहवें वित्त आयोग को 1975 करोड़ रूपये के प्रस्ताव भेजे गये हैं।
बैठक में जानकारी दी गई कि इस साल प्रदेश में विभिन्न योजनाओं के तहत कुल 61 हजार 135 हैक्टेयर में विभिन्न प्रजाति का वृक्षारोपण किया गया है। अगले वर्ष 30 हजार 365 हैक्टेयर में विभिन्न प्रजाति का और 40 हजार 935 हैक्टेयर में बाँस रोपण का लक्ष्य प्रस्तावित किया गया है। इसके अलावा इस साल पर्यावरण वानिकी, विद्यावन एवं मायसिटी-ग्रीन सिटी कार्यक्रमों के तहत 12 लाख 53 हजार पौधे लगाये गये हैं।
बैठक में बताया गया कि विभाग द्वारा वृक्षारोपण कार्य का मूल्यांकन नियमित रूप से किया जा रहा है। वनमण्डल स्तर पर 6 माह के रोपण का शत-प्रतिशत मूल्यांकन प्रतिवर्ष अक्टूबर एवं मई माह में किया जाता है। रोपण के द्वितीय एवं चतुर्थ वर्ष में वृत्त स्तरीय मूल्यांकन प्रतिवर्ष नवम्बर माह में किया जाता है। वृक्षारोपण कार्य का बाह्य मूल्यांकन रोपण के तीसरे एवं पांचवे वर्ष में राज्य वन अनुसंधान संस्थान के माध्यम से कराया जाता है।
बैठक में वन राज्यमंत्री श्री जयसिंह मरावी, अपर मुख्य सचिव वन श्री प्रशांत मेहता, प्रधान मुख्य वन संरक्षक श्री ए.के. दुबे, वन विकास निगम के प्रबन्ध संचालक डा. शुक्ला सहित वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

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Saturday, December 5, 2009

वन संरक्षण में सूचना प्रौद्योगिकी के बेहतर उपयोग को प्राथमिकता

वन मंत्री श्री सरताज सिंह द्वारा वन सूचना प्रौद्योगिकी के कार्यों की समीक्षा
वन मंत्री श्री सरताज सिंह ने वन संरक्षण को प्राथमिकता में रखते हुए सूचना प्रौद्योगिकी के बेहतर उपयोग पर बल दिया है। श्री सिंह आज यहां सतपुड़ा भवन स्थित वन मुख्यालय में सूचना प्रौद्योगिकी गतिविधियों की समीक्षा कर रहे थे। उन्होंने कहा कि इन प्रणालियों का जमीनी स्तर पर उपयोग किया जाये ताकि वन प्रबंधन के बेहतर परिणाम मिल सके। इस अवसर पर अपर मुख्य सचिव वन श्री प्रशांत मेहता, प्रधान मुख्य वन संरक्षक श्री ए.के. दुबे तथा वरिष्ठ वन अधिकारी उपस्थित थे।
वन मंत्री ने कहा कि वन क्षेत्रों में अवैध कटाई के साथ ही पशु चराई से होने वाले नुकसान को नियंत्रित करने के लिए प्रयास किये जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि फील्ड में पदस्थ कर्मचारियों को सूचना प्रौद्योगिकी का समुचित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, ताकि इसके उपयोग से वन प्रबंधन को बेहतर किया जा सके। श्री सिंह ने कहा कि वन अधिकार के तहत भूमि सीमांकन का काम सूचना प्रौद्योगिकी के तहत तैयार किये गये साफ्टवेयर द्वारा किया जा रहा है। इसके लिए कर्मचारियों को समुचित प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाये।
न मंत्री ने कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी के तहत तैयार की गई प्रणालियों का उपयोग जमीनी स्तर पर वानिकी गतिविधियों के क्रियान्वयन में होना चाहिए ताकि बेहतर परिणाम मिल सके। इससे फील्ड स्तर पर पदस्थ कर्मचारियों में जिम्मेदारी की भावना आने के साथ ही कम समय सीमा मेंं कार्यों को अधिक सक्षमता के साथ किया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि वर्ष 2005 से अभी तक वन क्षेत्रों में आये बदलाव का आंकलन किया जाये, ताकि इसके आधार पर क्षेत्र विशेष के लिए वन प्रबंधन की रणनीति तय की जा सके।
बैठक में बताया गया कि देश में मध्य प्रदेश ने अग्रणी होकर वनों एवं वन्य प्राणियों के संरक्षण एवं प्रबंधन के लिए सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग किया है जिसका अनुकरण अब अन्य प्रदेशों द्वारा किया जा रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग के लिए मध्य प्रदेश, वन विभाग के नेतृत्व में दल गठित किया गया है। प्रदेश में वन अधिकार के तहत भूमि सीमांकन के लिए सूचना प्रौद्योगिकी द्वारा तैयार की गई प्रणाली का उपयोग सफल रहा है। अब अन्य राज्य भी इस प्रणाली का उपयोग कर वन अधिकार के तहत अधिकार पत्र वितरित करने लगे हैं।
अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक सूचना प्रौद्योगिकी श्री अनिल ओबेराय ने बताया कि कम्प्यूटर आधारित वन प्रबंधन प्रणालियों द्वारा विभिन्न वानिकी गतिविधियों का आंकलन किया जा सकता है। इसके लिए विभाग द्वारा डाटा सेंटर स्थापित किया गया है। प्रदेश में स्थित वनक्षेत्रों के मानचित्रों का डिजिटाईजेशन कार्य पूर्ण कर लिया गया है। कौशल उन्नयन के तहत लगभग 10 हजार वन कर्मियों को प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जा चुका है। वन क्षेत्रों में अग्नि घटनाओं की सूचना देने के लिए फायर अलर्ट मैसेजिंग सिस्टम काफी उपयोगी रहा है।
बैठक में वन मंत्री के समक्ष प्रस्तावित नवीन वन भवन के निर्माण की प्रगति का प्रस्तुतीकरण किया गया। मुख्य वन संरक्षक सामुदायिक वन प्रबंधन परियोजना श्री जव्वाद हसन ने बताया कि भोपाल में वर्तमान में वन विभाग के विभिन्न संस्थानों के मुख्यालय (प्रधान मुख्य वन संरक्षक कार्यालय, म.प्र.राज्य लघु वनोपज संघ कार्यालय, म.प्र. राज्य वन विकास निगम कार्यालय एवं ईको पर्यटन विकास बोर्ड कार्यालय) विभिन्न भवनों में स्थापित हैं तथा इन भवनों में पर्याप्त स्थान उपलब्ध नहीं हैं।
अन्य कई राज्यों में पृथक से वन भवन बनाये गये हैं तथा बनाये जा रहे हैं। अतः वन भवन की आवश्यकता मध्य प्रदेश में भी है। यह प्रस्तावित वन भवन तुलसी नगर स्थित लिंक रोड नंबर 2 पर शासकीय भूमि, जो शासन द्वारा उपलब्ध कराई गयी है, पर बनाया जाना प्रस्तावित है।
प्रस्तावित नवीन वन भवन का निर्माण क्षेत्र लगभग 2 लाख 80 हजार वर्ग फुट होगा तथा 1024 अधिकारियों एवं कर्मचारियों के लिये यह बनाया जायेगा। प्रथम चरण के प्राक्कलन अनुसार भवन की लागत लगभग रूपये 49 करोड़ आंकी गयी है। माननीय मुख्य मंत्रीजी द्वारा नवीन वन भवन का शिलान्यास 27 जुलाई, 2008 को किया जा चुका है।
पर्यावरण नियोजन एवं समन्वय संगठन के माध्यम से काउन्सिल ऑफ आर्किटेक्चर (भारत सरकार की वैधानिक संस्था) के दिशा निर्देशों का पालन करते हुये मेसर्स इनफार्म आर्किटेक्ट, बैंगलोर का चयन वास्तुविद के रूप में किया गया है। म.प्र. राज्य पर्यटन विकास निगम को निर्माण एजेन्सी नियुक्त किया गया है जिसके द्वारा राष्ट्रीय स्तर के 6 भवन निर्माताओं को चयन सूची में रखा गया है। वास्तुविद द्वारा भवन के नक्शे, डिजाइन, टेण्डर संबंधित अभिलेख, वन विभाग को प्रस्तुत किये जा चुके हैं।
प्रस्तावित भवन में अग्नि सुरक्षा एवं जल संरक्षण का प्रावधान विशेष रूप से किया गया है। वन विभाग द्वारा विकसित किये जा रहे जी.आई.एस. (भौगोलिक सूचना प्रबंध प्रणाली) एवं कम्प्यूटर तकनीक के लिये वन भवन को विशेष सुविधायुक्त बनाया जायेगा। भवन में वाहनों के लिए बेसमेंट पार्किंग का प्रावधान किया जायेगा। भवन का डिजाइन एवं सामग्री का उपयोग इस प्रकार किया जायेगा कि यह ग्रीन बिल्डिंग सर्टिफिकेशन के मापदंडों पर खरा उतरे। भवन अत्याधुनिक स्तर का होगा।

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Tuesday, December 1, 2009

ईको पर्यटन विकास निगम की स्थापना पर विचार - वन मंत्री श्री सरताज सिंह

पर्यटकों के लिये अन्य पर्यटन सुविधाएं उपलब्ध हो
वन मंत्री श्री सरताज सिंह ने मध्यप्रदेश में ईको पर्यटन स्थलों पर सुविधाओं के विकास के लिये ईको पर्यटन विकास निगम की स्थापना के सम्बन्ध में विचार करने पर बल दिया है।गत दिन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ हुई एक बैठक में वन मंत्री श्री सिंह ने कहा कि मध्यप्रदेश ईको पर्यटन विकास बोर्ड द्वारा किये जा रहे ईको पर्यटन क्षेत्रों के विकास कार्यों के साथ अब व्यवसायिक गतिविधियां भी जुड़ती जा रही है। 
न्होंने कहा कि प्रदेश के ईको पर्यटन क्षेत्रों से देश-विदेश के पर्यटकों को तभी प्रभावी रूप से जोड़ा जा सकता है जब वहां पर्यटकों के लिये अन्य पर्यटन सुविधाएं उपलब्ध हो। इन गतिविधियों के सुचारू सम्पादन के लिए ईको पर्यटन विकास बोर्ड के स्थान पर ईको पर्यटन विकास निगम की स्थापना की आवश्यकता है।
श्री सिंह ने इस सम्बन्ध में समग्र रूप से विचार कर प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश बैठक में दिये। बैठक में अपर मुख्य सचिव वन श्री प्रशांत मेहता, प्रधान मुख्य वनसंरक्षक श्री ए.के. दुबे एवं विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी श्री पुष्कर सिंह उपस्थित थे।

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Monday, November 30, 2009

मप्र वर्ष 2010 को बांस वर्ष के रूप में मनायेगा

प्रदेश में तीन करोड़ बांस पौधे लगाये जायेंगे
मध्यप्रदेश में वर्ष 2010 को वन विभाग बांस वर्ष के रूप में मनायेगा। वन मंत्री श्री सरताज सिंह ने बताया कि बांस वर्ष 2010 के लिये प्राथमिक तौर पर तीन करोड़ बांस के पौधे वन एवं अन्य क्षेत्रों में लगाने का लक्ष्य तय किया गया है। इस कार्यक्रम को व्यापक जनाधार देने के लिये पर्यावरण वानिकी एवं विद्यावन जैसी योजनाओं में भी बांस रोपण किया जायेगा।श्री सरताज सिंह ने बताया कि बांस वर्ष 2010 के लक्ष्य की पूर्ति के लिये विभिन्न शासकीय एवं अशासकीय संस्थाओं के पास उपलब्ध सुरक्षित क्षेत्रों का भी उपयोग किया जायेगा। गांवों में तालाबों के किनारे तथा अन्य उपयुक्त सार्वजनिक स्थानों पर भी बांस रोपण कराया जायेगा। इसके लिये संबंधित संयुक्त वन प्रबंध समितियों, ग्राम सभाओं एवं ग्राम पंचायतों को इस कार्य से जोड़ा जायेगा।
वन मंत्री ने बताया कि बांस वर्ष 2010 के लिये अभी से विभिन्न स्तरों पर प्रचार तंत्रों के माध्यम से व्यापक प्रचार-प्रसार किया जायेगा। जिले के संबंधित प्रभारी मंत्रियों एवं अन्य सभी जन-प्रतिनिधियों के माध्यम से भी बैठकों में इसकी जानकारी दी जायेगी और क्षेत्रीय नागरिकों से अपील की जायेगी।
बांस वर्ष 2010 मनाने के संबंध में शासन द्वारा निर्देश भी जारी कर दिये गये हैं। निर्देशों में कहा गया है कि अनुसंधान एवं विस्तार शाखा की क्षेत्रीय इकाईयां जिलेवार उपलब्ध बांस के पौधों का आकलन करें। जिन जिलों में बांस पुष्पन हुआ है, उन जिलों में बांस बीज की उपलब्ध मात्रा से प्रधान मुख्य वन संरक्षक को 20 दिसम्बर तक अवगत कराया जाये।
सभी क्षेत्रीय वन अधिकारी अपने क्षेत्र का आकलन करें कि वन क्षेत्रों तथा वन क्षेत्रों के बाहर किस-किस विशिष्ट क्षेत्र में कितने-कितने क्षेत्रफल में पौधे लगाये जा सकेंगे और ऐसे क्षेत्रों की अभी से पहचान की जाये। वन क्षेत्रों तथा नगरीय क्षेत्रों में आकलन की जिम्मेदारी संबंधित वन मण्डलाधिकारी को दी गई है। वन क्षेत्रों के बाहर ग्रामीण क्षेत्रों में आकलन की जिम्मेदारी अनुसंधान एवं विस्तार इकाईयों की होगी। 
अनुसंधान एवं विस्तार इकाईयां प्रत्येक विकासखण्ड में कम से कम एक गांव चिन्हित करेंगी जहां प्रत्येक कृषक की भूमि एवं सार्वजनिक भूमि में रोपण के लिये प्रचार-प्रसार कर नियोजन किया जायेगा। वन के अलावा अन्य भूमि में भी क्षेत्र तैयारी का कार्य विभागीय रोपण की भांति भूमि स्वामित्व वाली संस्था/व्यक्ति के माध्यम से अग्रिम रूप से कराया जाये। इस प्रकार चिन्हित किये गये रोपण स्थलों के लिये पौधे तैयार करने की कार्यवाही तत्काल शुरू की जाये।

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Sunday, November 29, 2009

वनों में सामान्य पौधों के बीच औषधीय पौधे लगाये - वन मंत्री सरताज सिंह

  इससे उपज प्राप्त होने से मूल्य संवर्धन हो सकेगा
मध्यप्रदेश के वनों में सामान्य पौधों के बीच अन्य छायादार औषधीय पौधे तथा खड़े वृक्षों पर लताएं (क्लाइंबर्स) के पौधे लगाने के निर्देश वन मंत्री श्री सरताज सिंह ने दिये है। वन मंत्री श्री सिंह कल अपर मुख्य सचिव वन श्री प्रशांत मेहता, प्रधान मुख्य वन संरक्षक श्री ए.के. दुबे और विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी श्री पुष्कर सिंह के साथ विभागीय कार्यों की समीक्षा कर रहे थे।श्री सिंह ने कहा कि मध्यप्रदेश के वनों में औषधीय पौधों के रोपण की अपार संभावनाएं है। उन्होंने कहा कि विभाग द्वारा तैयार किये गये वृक्षारोपण स्थलों पर सामान्य पौधों के बीच स्थानीय तौर पर उपलब्ध प्रजातियों के औषधीय एवं लताओं के पौधे भी लगाये जायें। इससे वनों में सामान्य पौधों के अलावा अन्य उपज प्राप्त होने से मूल्य संवर्धन हो सकेगा।
अपर मुख्य सचिव वन श्री प्रशांत मेहता ने बताया कि इस कार्य के लिये राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना अथवा मध्यप्रदेश राज्य लघु वनोपज संघ से प्राप्त राशि का उपयोग किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि पुराने वृक्षारोपण स्थलों के मूल्य संवर्धन के लिये 31 दिसम्बर तक प्रोजेक्ट तैयार कर सक्षम अधिकारी को स्वीकृति हेतु प्रस्तुत करने के निर्देश मैदानी अधिकारियों को दिये जा रहे हैं।
प्रधान मुख्य वन संरक्षक श्री ए.के. दुबे ने कहा कि इस योजना के क्रियान्वयन के लिये रोपण/बीजरोपण का कार्य आगामी बरसात के मौसम में किया जायेगा। यह कार्य वन समितियों के माध्यम से कराया जायेगा। इसके पूर्व राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारन्टी योजना/म.प्र. राज्य लघु वनोपज संघ को बीज संग्रहण तथा बीज रोपण की योजना तैयार कर सम्बन्धित सक्षम अधिकारी से स्वीकृति प्राप्त करने की कार्रवाई की जायेगी।

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Wednesday, November 25, 2009

वृक्ष विहीन पहाड़ियों पर वनीकरण होना चाहिए -सरताज

वन विभाग की परामर्शदात्री समिति की बैठक सम्पन्न
वन मंत्री श्री सरताज सिंह ने वन व्यवस्थापन की प्रक्रिया को तेज करने की आवश्यकता पर बल दिया है। श्री सिंह ने आज यहां विधान सभा में वन विभाग की परामर्शदात्री समिति की बैठक को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि वृक्ष विहीन पहाड़ियों पर वनीकरण के लिए विशेष योजना तैयार की जाना चाहिए।वन मंत्री श्री सिंह ने कहा कि वन व्यवस्थापन की विसंगतियों को दूर करने के साथ ही इसकी प्रक्रिया को तेज किया जाए। इसके लिये नक्शों में आवश्यक सुधार भी किए जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि प्रदेश में 37 लाख हेक्टेयर बिगड़े वन क्षेत्र हैं। इन वृक्ष विहीन वन क्षेत्रों में विशेष योजना तैयार कर वनीकरण की संभावनाएं तलाशी जाना चाहिए। श्री सिंह ने कहा कि प्रदेश के विकास में वन संसाधनों का विशेष महत्व है, अत: वनों के बेहतर प्रबंधन का प्रयास किया जाना चाहिए।
राज्य मंत्री वन श्री जयसिंह मरावी ने बैठक में कहा कि वनों के संरक्षण और विकास के साथ ही वन क्षेत्रों में रहने वालों के विकास के लिये भी मेहनत करना होगी। वनों में रहने वाले विकास की धारा से जुड़े रहें, इस ओर भी ध्यान देना होगा। उन्होंने वन अधिकारियों को वन स्थल पर जाकर कार्य करने की आवश्यकता पर बल दिया।
परामर्शदात्री समिति के सदस्यों ने बैठक में सुझाव दिये कि वनाधिकार पट्टे मिलने के बाद, ऐसे गांवों के विकास के लिये स्वच्छ पेयजल, सड़क तालाब निर्माण आदि कार्य होने चाहिये। इन कार्यों में वन विभाग सहयोग करें। वन वृक्षारोपण कार्यों की देखरेख की व्यवस्था दस साल तक हो। बांस रोपण पर विशेष ध्यान दिया जाय। 
जो किसान बांस रोपण के इच्छुक है, उन्हें प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। खरगोन, बड़वानी, धार, झाबुआ एवं अन्य जिलों की खुली पहाड़ियों पर रतनजोत एवं अन्य ऐसी प्रजातियों का रोपण किया जाये, जिन के उत्पादन से स्थानीय निवासियों को स्थाई रोजगार भी मिल सके।
परामर्शदात्री समिति सदस्यों ने कहा कि वन्यप्राणियों द्वारा क्षति पहुंचाने पर क्षतिपूर्ति प्रकरण के लिये प्रक्रिया सरल होनी चाहिये। प्रभावित व्यक्ति को वन-राजस्व कार्यालयों में भटकना न पड़े और उसे यथासम्भव शीघ्र क्षतिपूर्ति प्राप्त हो। तेन्दूपत्ता संग्राहक की मृत्यु होने पर उसके परिवार को तत्काल ही बीमा का लाभ प्राप्त हो, ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिये। वन संरक्षण के लिये उत्कृष्ट कार्य करने वाली ग्राम वन समितियों को पुरस्कृत किया जाना चाहिये। 
वन क्षेत्रों में बने प्राचीन देवालयों के संरक्षण एवं सुधार की अनुमति देने पर विचार किया जाय। मण्डला जिला मुख्यालय के पास बिछिया में कान्हा राष्ट्रीय उद्यान के गेट का निर्माण हो और वहां स्थित तालाब में नौकायन की व्यवस्था के साथ ही इस क्षेत्र में पर्यटन सुविधाएं विकसित की जायें। काष्ठ व्यापार अधिनियम 1973 का सरलीकरण हो ताकि छोटे व्यापारी भी लाभ प्राप्त कर सकें।
अभ्यारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों में बसे वनवासियों की स्थिति बेहतर करने के प्रयास हो। प्रतिबन्धात्मक नियमों का सरलीकरण हो। सिंग्रामपुर-तेजगढ़ वन परिक्षेत्र में इको टूरिज्म सेन्टर विकसित किया जाये। नौरादेही वन्यप्राणी अभ्यारण्य के कुछ गांवों को अभ्यारण्य की सीमारेखा से बाहर किया जाये और कुछ गांवों को अन्य वन मण्डल में शामिल किया जाये तथा कुछ गांवों को डि-नोटीफाई किया जाये।
बैठक में अपर मुख्य सचिव वन श्री प्रशांत मेहता ने बताया कि वनों के सुधार एवं विकास की प्रक्रिया से जुड़े विषयों पर विभाग द्वारा दिसम्बर माह में मंथन कार्यक्रम शुरू किया जा रहा है। इस कार्यक्रम में रेंज, वन मण्डल, वन संरक्षण एवं मुख्यालय स्तर पर विचार किया जायेगा और प्रक्रिया सरलीकरण पर भी विचार होगा। वन-राजस्व सीमा विवाद पर ध्यान दिया जायेगा। वन क्षेत्र से 5 कि.मी. परिधि में जलाऊ लकड़ी एवं चारागाह विकास के लिये रोपण कार्यक्रम लिया जायेगा। अगले वर्ष को बांस रोपण वर्ष के रूप में मनाया जायेगा।
मेहता ने बताया कि बैगा जनजाति को भी बसोर जाति की तरह बांस लेने की अनुमति दी गई है। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय उद्यानों/अभ्यारण्यों में आने वाले 117 गांवों को टापू बनाकर राजस्व ग्राम में परिवर्तित करने और वनों के किनारे वाले गांवों को वन सीमा से बाहर करने के लिये उच्चतम न्यायालय में प्रतिवेदन प्रस्तुत किया है।
श्री मेहता ने बताया कि विभाग ने वनाधिकार अधिनियम के तहत पट्टे देने के कार्य में पूरा सहयोग किया है। विभाग के पास उपलब्ध वन क्षेत्र वासियों की सूची जिला कलेक्टरों को उपलब्ध कराई गई। वन ग्रामों को राजस्व ग्रामों में परिवर्तित करने की प्रक्रिया उक्त अधिनियम में हैं। उन्होंने बताया कि वन ग्रामों के विकास की योजना का क्रियान्वयन किया जा रहा है।
प्रमुख वन संरक्षक श्री ए.के. दुबे ने बताया कि मध्यप्रदेश का वन विभाग स्थापना के 150 वर्ष पूरे करने जा रहा है। देश में 1897 में सबसे पहले होशंगाबाद में वर्किंग प्लान बना था। समय के साथ-साथ, प्रदेश में नई संरचनाएं लागू की गई। प्रदेश के वर्किंग प्लान की विभिन्न राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा हुई है।
प्रदेश में 334 वन चौकियां स्थापित है और नई चौकियां बनाई जा रही है। बन्दूक-रिवाल्वर क्रय किये है और इनके उपयोग के अधिकार केन्द्र से प्राप्त किये हैं। प्रदेश के फायर अलर्ट मैसेजिंग सिस्टम की राष्ट्र स्तर पर प्रशंसा की गई है। प्रदेश के वन क्षेत्रों में बिगड़े वनों का सुधार कार्य किया जा रहा है।देश में ऊर्जा वन, विद्यावन, चारागाह विकास, माई-सिटी-ग्रीन सिटी एवं हरियाली योजना लागू की गई है। प्रदेश में 15 हजार 228 वन समितियां वन प्रबन्धन में सहयोग कर रही है।
बैठक में परामर्शदात्री समिति के सदस्य विधायक सर्वश्री रत्नेश सालोमन, नारायण सिंह पट्टा, भगत सिंह नेताम, अंतर सिंह आर्य, अल्केश आर्य, लक्ष्मण तिवारी, म.प्र. राज्य लघु वनोपज संघ के प्रबन्ध संचालक श्री आर.के. दवे, प्रधान मुख्य वनसंरक्षक (वन्यप्राणी) श्री आर.एस. नेगी, प्रधान मुख्य वनसंरक्षक (कार्य आयोजना) डॉ. एस. पाबला, ईको पर्यटन विकास बोर्ड की मुख्य कार्यपालन अधिकारी डॉ. गोपा पाण्डेय तथा सचिव वन श्री रतन पुरवार सहित वरिष्ठ वन अधिकारी उपस्थित थे।

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Friday, November 13, 2009

प्रदेश में विकसित किए जाएंगे नये ईको पर्यटन केन्द्र

वन मंत्री  ने  की समीक्षा विभाग की अभिनव परियोजनाओं की
वनमंत्री श्री सरताज सिंह ने प्रदेश में ईकोपर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिये नए पर्यटन केन्द्र विकसित करने पर बल दिया है। श्री सिंह आज यहां मंत्रालय में विभाग द्वारा तैयार की जा रही कुछ अभिनव परियोजनाओं की समीक्षा कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि इन योजनाओं को बेहतर ढंग से तैयार कर शीघ्र पूरा किया जाए। वन मंत्री ने आज लहारपुर ईकोलॉजिकल गार्डन, वन विहार फेज - दो, अनिर्या ईको पार्क, रीवा शहर में ईको पर्यटन पार्क, सतना में चिड़ियाघर, केरवा में ईको पर्यटन केन्द्र के संबंध में अभी तक की प्रगति की समीक्षा की।
बैठक में उपस्थित अपर मुख्य सचिव, श्री प्रशांत मेहता ने इन परियोजनाओं के नोडल अधिकारियों को उचित मार्गदर्शन दिया। बैठक में प्रधान मुख्य वन संरक्षक श्री ए.के. दुबे, प्रधान मुख्य वन संरक्षक (कार्य आयोजना) डॉ. एच.एस. पाबला, मुख्य वन्य प्राणी अभिरक्षक, श्री आर.एस. नेगी, मुख्य कार्यपालन अधिकारी, ईको पर्यटन विकास बोर्ड श्रीमती गोपा पाण्डेय सहित विभाग के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।
भोपाल के लहारपुर में ईकोलॉजिकल गार्डन विकसित किया जा रहा है। इस उद्यान का विकास समग्र पारिस्थितकीय तंत्र को ध्यान में रखकर किया जायेगा। देश में अपनी तरह के पहले इस वानस्पतिक उद्यान में पब्लिक प्रायवेट पार्टनरशिप द्वारा 1696 हेक्टेयर क्षेत्र में दुर्लभ वृक्ष प्रजातियों के रोपण के साथ ही पर्यटकों के लिये मनोरंजन के स्थल विकसित किया जाएगा।
इसमें जैव विविधता को संरक्षण देते हुये विश्व की दुर्लभ एवं लुप्तप्राय प्रजातियों का रोपण, उच्च तकनीक रोपणी, इंटरप्रिटेशन व मनोरंजन केन्द्र, हरबेरियम, बोन्साई क्षेत्र आदि का विकास किया जाएगा।
भोपाल के केरवा में वन विहार फेज -दो को पब्लिक प्रायवेट पार्टनरशिप द्वारा चिड़ियाघर के रूप में विकसित किया जाएगा। यहां पर्यटकों को अन्तराष्ट्रीय स्तर की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। इस परियोजना में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सिंगापुर चिड़ियाघर के संचालन का दीर्घ अनुभव रखने वाले श्री बर्नार्ड हेरीसन का मार्गदर्शन प्राप्त किया गया है।
भोपाल स्थित केरवा जल संसाधन विभाग के विश्राम गृह परिसर में केरवा ईको पार्क म.प्र. राज्य पर्यटन विकास निगम के सहयोग से विकसित किया जा रहा है। इसमें मचान, ट्री हट, फव्वारा इत्यादि विकसित कर इसे आदर्श पिकनिक स्थल का स्वरूप प्रदान किया जाएगा।
देवास जिले के सोनकच्छ तहसील में भोपाल से 120 किलोमीटर दूरी पर लगभग पांच हेक्टेयर क्षेत्र में 'अनिर्या ईको पार्क' को पब्लिक प्रायवेट पार्टनरशिप के आधार पर विकसित किया जायेगा। इस क्षेत्र में ग्रामीण परिवेश उपलब्ध कराते हुये हर्बल उद्यान, रात्रि विश्राम के लिये ग्रामीण आवास, हर्बल उपचार, पंचकर्म उपचार, तांगा बैलगाड़ी, घोड़ागाड़ी आदि की सैर, वाटरपार्क, म्यूजिकल फाउन्टेन, हर्बल उत्पाद विक्रय केन्द्र आदि कार्य किये जाएंगे।
रीवा नगर में बीहर नदी में दो टापू हैं, जहां ईको पर्यटन केन्द्र विकसित किया जाएगा।
सतना में 100 हेक्टेयर क्षेत्र में चिड़ियाघर विकसित किया जाएगा। यहां इसके साथ वन्य प्राणियों का रेस्क्यू सेंटर भी विकसित होगा। सुप्रसिद्ध नंदन कानन को विकसित करने वाले श्री एस.के. पटनायक के मार्गदर्शन में इस क्षेत्र को विकसित किया जाएगा।

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