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Thursday, December 17, 2009

वन संरक्षण की प्राथमिकताएं पुन: तय करें - वन मंत्री श्री सरताज सिंह

 ग्रामवासी वनों के नुकसान के प्रति सजग हों
वन मंत्री श्री सरताज सिंह ने कहा कि वनों के संवर्धन एवं संरक्षण के साथ ही बिगड़े वनों की पुर्नस्थापना की प्राथमिकताएं और अधिक सुधार के साथ पुन: तय की जायें। वन मंत्री गत दिवस एक बैठक में वन संरक्षण से सम्बन्धित कार्यों की समीक्षा कर रहे थे। उन्होंने कहा कि वनों को क्षति जलाऊ लकड़ी काटने और पशु चराने के कारण होती है। इससे कैसे बचा जाये, यह प्राथमिकता में होना चाहिये।
श्री सरताज सिंह ने कहा कि प्राथमिकता यह होनी चाहिये कि वन क्षेत्रों के समीपस्थ ग्रामों में वे सभी संसाधन उपलब्ध कराये जायें जिनसे वनों पर निर्भरता कम हो और ग्रामवासी वनों के नुकसान के प्रति सजग हों। अभी वनों को जो नुकसान हो चुका है, उसकी पूर्ति किस प्रकार से जल्दी की जाये, इसे ओर गम्भीरता से विचार कर कार्य करना हमारी प्राथमिकता में शामिल हो।
बैठक में बताया गया कि विभागीय कार्य आयोजना के अनुरूप प्रदेश में प्रतिवर्ष औसतन डेढ़ लाख हैक्टेयर बिगड़े वन क्षेत्रों का नियमित उपचार किया जा रहा है। राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम के तहत प्रतिवर्ष औसतन 13 हजार हैक्टेयर में रोपण किया जा रहा है।
विभाग की अनुसंधान एवं विस्तार वृत्त इकाईयों के माध्यम से गैर वन क्षेत्रों में वृक्षारोपण बढ़ाने के प्रयास किये जा रहे है। राज्य वन विकास निगम द्वारा पिछले तीन दशकों में 3 लाख 20 हजार हैक्टेयर वन क्षेत्र में रोपण किया गया है। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारन्टी योजना के तहत पिछले वर्षों में लगभग 34 हजार हैक्टेयर में रोपण किया गया है। बारहवें वित्त आयोग के तहत पिछले पांच वर्षों में प्रदेश के 11 हजार 400 हैक्टेयर वृक्षविहीन क्षेत्रों को हरा-भरा करने के लिये वृक्षारोपण किया गया है।
बैठक में बताया गया कि वनों पर दबाव कम करने के लिये अन्य विभागों द्वारा कार्यवाही की आवश्यकता है। मुख्य रूप से ग्रामीण विकास विभाग द्वारा वनों से लगे ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका विकास, पशुपालन विभाग द्वारा पशुनस्ल सुधार, कृषि विभाग द्वारा बारानी खेती क्षेत्रों की उत्पादकता में वृद्धि तथा ऊर्जा विकास निगम द्वारा वैकल्पिक ऊर्जा स्त्रोतों को बढ़ावा एवं ऊर्जा बचत के लिये उन्नत चूल्हा, बायोगैस, सोलर कुकर आदि का उपयोग प्राथमिकता से बढ़ाने की आवश्यकता है।
बैठक में बताया गया कि इसके साथ ही विभाग द्वारा विस्तार के माध्यम से जलाऊ लकड़ी, बल्ली एवं बांस प्रदाय की सुविधा ग्रामीणों को दी गई है। वन संरक्षण एवं संवर्धन तथा सुरक्षा के कार्यों में जनभागीदारी के लिये 15 हजार 228 वन समितियों का सहयोग लिया जा रहा है। लोक वानिकी के अन्तर्गत निजी वन क्षेत्रों के वैज्ञानिक प्रबंधन को बढ़ावा दिया जा रहा है।
निजी भूमि पर वृक्षों के काटने एव परिवहन के नियमों का सरलीकरण किया गया है। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारन्टी योजना में वर्ष 2009-10 के लिये 631 करोड़ रूपये के प्रस्ताव दिये गये है। वन विकास अभिकरणों के माध्यम से भारत सरकार से वित्तीय संसाधन प्राप्त करने हेतु प्रस्ताव दिये गये है। तेरहवें वित्त आयोग को 1975 करोड़ रूपये के प्रस्ताव भेजे गये हैं।
बैठक में जानकारी दी गई कि इस साल प्रदेश में विभिन्न योजनाओं के तहत कुल 61 हजार 135 हैक्टेयर में विभिन्न प्रजाति का वृक्षारोपण किया गया है। अगले वर्ष 30 हजार 365 हैक्टेयर में विभिन्न प्रजाति का और 40 हजार 935 हैक्टेयर में बाँस रोपण का लक्ष्य प्रस्तावित किया गया है। इसके अलावा इस साल पर्यावरण वानिकी, विद्यावन एवं मायसिटी-ग्रीन सिटी कार्यक्रमों के तहत 12 लाख 53 हजार पौधे लगाये गये हैं।
बैठक में बताया गया कि विभाग द्वारा वृक्षारोपण कार्य का मूल्यांकन नियमित रूप से किया जा रहा है। वनमण्डल स्तर पर 6 माह के रोपण का शत-प्रतिशत मूल्यांकन प्रतिवर्ष अक्टूबर एवं मई माह में किया जाता है। रोपण के द्वितीय एवं चतुर्थ वर्ष में वृत्त स्तरीय मूल्यांकन प्रतिवर्ष नवम्बर माह में किया जाता है। वृक्षारोपण कार्य का बाह्य मूल्यांकन रोपण के तीसरे एवं पांचवे वर्ष में राज्य वन अनुसंधान संस्थान के माध्यम से कराया जाता है।
बैठक में वन राज्यमंत्री श्री जयसिंह मरावी, अपर मुख्य सचिव वन श्री प्रशांत मेहता, प्रधान मुख्य वन संरक्षक श्री ए.के. दुबे, वन विकास निगम के प्रबन्ध संचालक डा. शुक्ला सहित वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

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