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Monday, April 5, 2010

वोट बैंक और तुष्टिकरण की राजनीति के चलते राष्ट्रीय सुरक्षा संभव नहीं

जंग से बचने की कोशिश में देश के हितों से समझौता न हो
जम्मू कश्मीर और असम के पूर्व राज्यपाल तथा भारत के पूर्व उप थल सेना प्रमुख ले. जनरल (रिटायर्ड) एस.के.सिन्हा ने कहा है कि भारत के समक्ष आज आंतरिक और बाहरी दोनों तरह की सुरक्षा को लेकर गंभीर चुनौतियां उपस्थित हैं। इन चुनौतियों से तभी निपटा जा सकता है जब सुरक्षा के मामले में राजनीति न हो, वोट बैंक की राजनीति न हो और तुष्टिकरण की नीति समाप्त हो और देश के लोग एकजुट होकर खड़े हों। ले. जनरल सिन्हा ने यह बात आज यहां माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय द्वारा पंडित माखनलाल चतुर्वेदी के जन्मदिन पर आयोजित व्याख्यानमाला के अंतर्गत राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौतियां’ पर अपने व्याख्यान में कही। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वित्त मंत्री श्री राघवजी थे।

अपने सारगर्भित और विद्वतापूर्ण व्याख्यान में ले. जनरल सिन्हा ने भारत के समक्ष आंतरिक और बाहरी चुनौतियों, उनकी पृष्ठभूमि तथा विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत की सुरक्षा को बाहरी चुनौतियां चीन और पाकिस्तान से हैं जबकि आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों में माओवादी आतंकवाद, अलगाववादी हिंसा और जिहादी आतंकवाद शामिल हैं। 
उन्होंने कहा कि भारत ने अपने ऊपर होने वाले हमलों का हमेशा कामयाबी के साथ मुकाबला किया है और अपनी सीमाओं की सुरक्षा की है। लेकिन हमें इससे संतुष्ट होकर नहीं बैठना है क्योंकि उपरोक्त दोनों तरह की चुनौतियां बहुत गंभीर हैं। उन्होंने कहा कि युद्ध के डर से या उससे बचने के लिये राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं किया जाना चाहिये। इस संदर्भ में उन्होंने कहा कि भारत आज भी पानीपत ग्रंथि से पीड़ित है।
पानीपत की हार सैनिक नेतृत्व की कमजोरी और रणनीतिक योजना में त्रुटि के साथ-साथ युद्ध की तैयारी में कमी के कारण हुई। आज हम किसी भी तरह कमजोर नहीं हैं लेकिन यह ग्रंथि हमारे पीछे आज भी लगी है। दुनिया का कोई भी देश आतंकवाद से इतने लंबे समय तक और इतना ज्यादा पीड़ित नहीं रहा जितना कि भारत। आजादी से लेकर अब तक करीब एक लाख लोग आतंकवादी हिंसा में मारे जा चुके हैं और लगभग इतने ही घायल हुए हैं।

चीन की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि चीन भारत को दक्षिण एशिया की महाशक्ति के रूप में उभरता हुआ नहीं देख सकता। उसकी सीमा विवाद को सुलझाने में कोई रुचि नहीं है। यह सही है कि दोनों देशों के बीच गोलीबारी नहीं हुई लेकिन चीन भारत को चारों तरफ से घेरने का प्रयास कर रहा है।
वह अपने जीडीपी का अधिक हिस्सा फौजी ताकत बढ़ाने में कर रहा है और रणनीतिक रूप से उपयोगी स्थानों पर लगातार निर्माण कार्य में लगा हुआ है। दूसरी तरफ दुर्भाग्य से हम इस मामले में लापरवाही कर रहे हैं। हमारी फौजों को आधुनिक बनाने के लिये दी जाने वाली रकम में से लगभग 30 प्रतिशत हम खर्च नहीं कर पाते और सरकार को समर्पित कर देते हैं, यह स्थिति ठीक नहीं है। हम चीन के साथ हथियारों की होड़ नहीं चाहते लेकिन हमें हिमालय सहित अन्य क्षेत्रों में चीन के किसी भी दुस्साहस से निपटने के लिये फौजी तैयारी रखने की जरूरत है।

पाकिस्तान की चर्चा करते हुए ले. जनरल सिन्हा ने कहा कि देश की आजादी के बाद पाकिस्तान जाने वाले लोगों ने महसूस किया कि वे भारत में बहुसंख्यक आबादी के साथ नहीं रह सकते अत: उन्होंने अपना अलग देश बना लिया। आज भारत जब एक आर्थिक और सैनिक महाशक्ति के रूप में उभर रहा है तो इसे पाकिस्तान पचा नहीं पा रहा। भारत ने तो कई बार कहा कि वह मजबूत पाकिस्तान देखना चाहता है लेकिन किसी पाकिस्तानी नेता ने आज तक यह नहीं कहा कि वह भारत की मजबूती चाहता है।
संयुक्त राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सीट को लेकन पाकिस्तान और चीन दोनों ने हमेशा विरोध किया है। पाकिस्तान के लोगों में अपने पूर्वजों के विजेता होने का गुमान अभी तक भरा हुआ है। भुट्टो ने कहा कि हम एक हजार साल तक भारत से जंग करेंगे और घास खाकर ही परमाणु बम बनायेंगे। ऐसी ही भाषा जनरल जिया उल हक बोलते थे। आज जरदारी भी शांति वार्ता की बात करते हैं लेकिन इसे हजार साल तक जारी रखने का कहते हैं। 
पाकिस्तान खुद आतंकवाद से पीड़ित है लेकिन फिर भी वह आतंकवाद का सबसे बड़ा केन्द्र बना हुआ है। मोहोम्मद सईद ने लाहौर में एक बड़ी सभा को संबोधित करते हुए हाल ही में कहा कि ज़िहाद सिर्फ जम्मू कश्मीर तक सीमित नहीं है, हम भारत को पाकिस्तान में मिलाकर रहेंगे और लाल किले पर कब्ज़ा करेंगे। पाकिस्तान भारत को परमाणु ब्लेकमेल भी करने की कोशिश कर रहा है। बेशक भारत के पास भी परमाणु शक्ति है लेकिन पाकिस्तान जानता है कि भारत नरम दिल देश है।

उत्तर पूर्व राज्यों में अलगाववादी हिंसा पर बोलते हुए ले. जनरल सिन्हा ने कहा कि वहां काफी हद तक इस पर काबू पाया जा चुका है। असम में अलगाववाद एक गंभीर चुनौती बना हुआ है। वहां हिंसा का प्रमुख कारण बंगलादेशियों की अवैध घुसपैठ रहा है जिसके कारण असम के मूल लोग पिछड़ गये। केन्द्र और असम में बैठी सरकारों ने वोट बैंक की राजनीति के तहत इसे बढ़ावा दिया। उन्होंने असम का राज्यपाल रहते हुए वहां अलगाववादी हिंसा को कम करने के लिये उठाये गये कदमों पर विस्तार से प्रकाश डाला और कहा कि वोट बैंक की राजनीति छोड़े बिना इस समस्या का समाधान नहीं होगा।

कश्मीर की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि वहां आतंकवाद, धार्मिक कट्टरता और पाकिस्तान द्वारा लड़े जा रहे परोक्ष युद्ध के कारण ज्यादा गंभीर है। कश्मीर में प्रेस पाकिस्तानी प्रेस से भी ज्यादा भारत विरोधी है। इन कारणों से वहां आतंकवाद पर वांछित रूप से नियंत्रण नहीं हो पा रहा। शुरू से लेकर आज तक कश्मीर में जो भी कदम उठाये गये वे गलत साबित हुए। इस संबंध में उन्होंने संयुक्त राष्ट्रसंघ जाने, हजरत बल मामले, फौज को कम करने आदि का उल्लेख किया। उन्होंने यह भी कहा कि कश्मीर समस्या को सिर्फ मुस्लिम समस्या के रूप में न देखकर पूरे कश्मीर की समस्या के रूप में समझा जाना चाहिये। इसमें जम्मू को भी सामने रखना चाहिये। जम्मू के मुसलमान धार्मिक कट्टरवादी नहीं हैं।

आंतरिक सुरक्षा के संदर्भ में उन्होंने 26 नवम्बर, 2008 को ताजमहल होटल पर हमले, बटला हाऊस मुद्दे आदि विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में पूरे राष्ट्र को एक स्वर में बात करना चाहिये। यह शर्म की बात है कि कुल 10 आतंकवादियों ने एक अरब जनसंख्या वाले देश को 24 घंटे तक बंधक बनाकर रखा। ताज मामले में देश के रक्षा मंत्री और प्रधानमंत्री अलग-अलग भाषाएं बोल रहे थे।
रक्षा मंत्री कह रहे थे कि भारत के सामने सभी विकल्प खुले हैं जबकि प्रधानमंत्री ने तत्काल बाद कहा कि युद्ध को छोड़कर सब विकल्प खुले हैं। यह स्थिति देश के लिये अच्छी नहीं है। बहरहाल, उन्होंने आंतरिक सुरक्षा के लिये केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदांबरम द्वारा उठाये गये कदमों की सराहना की। उन्होंने कहा कि ताज घटना से हमें यह शिक्षा लेनी चाहिये कि हमें अमेरिका सहित किसी पर भी निर्भर नहीं रहना है और आतंकवाद से अपने बूते निपटना है।

माओवादी हिंसा पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि आज भारत के 20 राज्यों के 230 जिले और दो हजार पुलिस थाने माओवादी हिंसा से पीड़ित हैं। छत्तीसगढ़ के बड़े हिस्से में माओवादियों की समानांतर सरकार चलती है। जो लोग माओवादी हिंसा को संवाद के द्वारा हल करना चाहते हैं वे लोग अहमक हैं, क्योंकि उनसे ताकत से ही निपटा जा सकता है।

मुख्य अतिथि के रूप में वित्त मंत्री श्री राघवजी ने कहा कि आतंकवाद और हिंसा से आज देश का हर व्यक्ति आंदोलित है। यह दुख की बात है कि जो देश कभी हमारे भौगोलिक क्षेत्र में थे वे ही आज हमारे खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। लेकिन इस बात के लिये जन-जागरण होना चाहिये कि देशहित सर्वोपरि है।

विशिष्ट अतिथि आयुक्त एवं सचिव जनसंपर्क श्री मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिये यह व्याख्यानमाला बहुत प्रासंगिक और उपयोगी है, क्योंकि भविष्य के पत्रकारों को देश की सुरक्षा से जुड़े हर पहलू की व्यापक और गहन समझ होनी चाहिये। उन्होंने कहा कि भारत अपने सुरक्षित होने के झूठे भ्रम का हमेशा शिकार रहा है। पृथ्वीराज चौहान ने बार-बार मोहोम्मद गौरी को पराजित करने के बाद उसे छोड़ दिया, जो इसी सुरक्षित होने के झूठे भ्रम का परिणाम था। उन्होंने कहा कि इस भ्रम को तोड़ने में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका है।

मुख्य सूचना आयुक्त श्री पद्मपाणि तिवारी ने फौज को आधुनिक बनाने तथा गुप्त सूचना तंत्र को मजबूत करने पर बल दिया।

प्रारंभ में विश्वविद्यालय के कुलपति, प्रोफेसर श्री ब्रजकिशोर कुठियाला ने अतिथियों का स्वागत कर उनका परिचय दिया। इस अवसर पर पत्रकार श्री विजय मनोहर तिवारी द्वारा माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय की दो दशक की यात्रा पर आधारित पुस्तक का विमोचन भी किया गया। विश्वविद्यालय की छात्राओं ने राष्ट्रगीत वंदे मातरम का गायन किया। अंत में विश्वविद्यालय की रेक्टर श्रीमती जे.आर. झनाने ने आभार व्यक्त किया।

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