प्रविष्टियां 20 फरवरी 2010 तक जमा होंगी
आदिम जाति कल्याण विभाग द्वारा स्वाधीनता संग्राम में उल्लेखनीय योगदान देने वाले प्रखर योद्धा शंकर शाह-रघुनाथ शाह के नाम से राष्ट्रीय सम्मान स्थापित किया गया है। सम्मान की स्थापना का उद्देश्य जनजातीय समाज में स्वाविभमान, अस्मिता, नेतृत्वगुणों, विशिष्ट विभूतियों के स्वर्णिम योगदान, त्याग और बलिदान से समाज को परिचित कराना है।
यह सम्मान भारतीय साहित्य में जनजातीय जीवन के सृजनात्मक सौंदर्य, परम्परा और विशिष्टता के उत्कृष्ट रेखांकन-लेखन में सुदीर्घ योगदान के लिये प्रदान किया जाता है। इस राष्ट्रीय सम्मान के अंतर्गत दो लाख रूपये की सम्मान निधि एवं प्रशस्ति पट्टिका प्रदान की जाती है। वर्ष 2010 में इस सम्मान के लिये प्रविष्टियां 20 फरवरी 2010 तक वन्या प्रकाशन राजीव गांधी भवन 35 श्यामला हिल्स, भोपाल में जमा कराई जा सकती है।
वर्ष 1857 के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अमर रणबांकुरे गोंड राजा शंकर शाह और उनके पुत्र रघुनाथ शाह प्रखर क्रान्तिकारी कवि थे। राजा शंकर शाह उस गढ़ा राज्य के वारिस थे, जिस पर प्रतापी राजा शांकर शाह और वीरांगना रानी दुर्गावती ने शासन किया था। सन् 1784 में गढ़ा राज्य पर सागर के मराठों का अधिकार होने के बाद उनके वारिसों को गुजर-बसर के लिये जबलपुर के पास एक जागीर दे दी गयी थी। राजा शंकर शाह की यह जागीर 1857 की क्रान्ति के समय क्रान्तिकारियों की गतिविधियों का केन्द्र बन गयी थी। ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ वीर शंकर शाह और उनके पुत्र रघुनाथ शाह ने देशभक्ति पर अनेक कविताएं लिखीं। इन कविताओं के जरिये अंग्रेजों के खिलाफ जन सामान्य में विरोध का भाव बहुत तेजी से उठा। वीर शंकर शाह-रघुनाथ शाह को स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को आदर के साथ याद किया जाता है।
आदिम जाति कल्याण विभाग द्वारा स्थापित इस सम्मान के संबंध में अन्य जानकारी फोन क्रमांक 0755-2661492, 2661152 अथवा ई-मेल vanya_prakashan@yahoo.co.in पर भी प्राप्त की जा सकती है।
वर्ष 1857 के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अमर रणबांकुरे गोंड राजा शंकर शाह और उनके पुत्र रघुनाथ शाह प्रखर क्रान्तिकारी कवि थे। राजा शंकर शाह उस गढ़ा राज्य के वारिस थे, जिस पर प्रतापी राजा शांकर शाह और वीरांगना रानी दुर्गावती ने शासन किया था। सन् 1784 में गढ़ा राज्य पर सागर के मराठों का अधिकार होने के बाद उनके वारिसों को गुजर-बसर के लिये जबलपुर के पास एक जागीर दे दी गयी थी। राजा शंकर शाह की यह जागीर 1857 की क्रान्ति के समय क्रान्तिकारियों की गतिविधियों का केन्द्र बन गयी थी। ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ वीर शंकर शाह और उनके पुत्र रघुनाथ शाह ने देशभक्ति पर अनेक कविताएं लिखीं। इन कविताओं के जरिये अंग्रेजों के खिलाफ जन सामान्य में विरोध का भाव बहुत तेजी से उठा। वीर शंकर शाह-रघुनाथ शाह को स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को आदर के साथ याद किया जाता है।
आदिम जाति कल्याण विभाग द्वारा स्थापित इस सम्मान के संबंध में अन्य जानकारी फोन क्रमांक 0755-2661492, 2661152 अथवा ई-मेल vanya_prakashan@yahoo.co.in पर भी प्राप्त की जा सकती है।
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