एक दिवसीय सेमिनार हुई, प्रशासन अकादमी और यूनिसेफ की कोशिश
प्रदेश में बच्चों से जुड़ी हुई विभिन्न चुनौतियों और मौजूदा मामलों पर एक सारगर्भित और प्रमाणिक चर्चा के लिए आज यहाँ एक दिवसीय सेमिनार में विषय विशेषज्ञ जुटे। आर.सी.वी.पी. नरोन्हा अकादमी और यूनिसेफ की यह संयुक्त कोशिश मध्यप्रदेश की विकास प्राथमिकताओं के संदर्भ में बाल अधिकारों की संभावनाओं पर केन्द्रित थी।
प्रशासन अकादमी के संचालक श्री मुक्तेश वार्ष्णेय का कहना था कि पिछले एक दशक पर यदि नज़र डालें तो प्रदेश में बाल कल्याण की दिशा में काफी काम हुआ है। लेकिन अब भी सभी बच्चों के अधिकार सुनिश्चित करने की चुनौतियां सामने हैं।
प्रशासन अकादमी के संचालक श्री मुक्तेश वार्ष्णेय का कहना था कि पिछले एक दशक पर यदि नज़र डालें तो प्रदेश में बाल कल्याण की दिशा में काफी काम हुआ है। लेकिन अब भी सभी बच्चों के अधिकार सुनिश्चित करने की चुनौतियां सामने हैं।
यूनिसेफ की मध्यप्रदेश इकाई के कार्यक्रम प्रबंधक श्री मनीष माथुर ने सेमिनार का मकसद बताते हुए कहा कि बच्चों से जुड़े मामलों में जानकारियों को बढ़ाना और उनके लिए एक ज्ञान तंत्र तैयार करना आज बड़ी जरूरत है। इससे प्रदेश के बच्चों को लाभान्वित करने में मदद मिलेगी।
प्रशासन अकादमी के महानिदेशक डॉ संदीप खन्ना ने इस सिलसिले में बोलते हुए कहा कि इस सेमिनार के जरिए अकादमी की कोशिश यह है कि बाल विकास में चुनौतियों को पहचान कर उनका संभावित हल निकाला जाए।
प्रशासन अकादमी के महानिदेशक डॉ संदीप खन्ना ने इस सिलसिले में बोलते हुए कहा कि इस सेमिनार के जरिए अकादमी की कोशिश यह है कि बाल विकास में चुनौतियों को पहचान कर उनका संभावित हल निकाला जाए।
जनसंख्या विज्ञान संबंधी अंतर्राष्ट्रीय संस्थान के श्री चंद्रशेखर ने कहा कि बच्चों के लिए सारे अधिकार हैं, असल मकसद यह है कि भेदभाव और असमानतायें कम करके पहुँचविहीन क्षेत्रों में जाया जाए। उन्होंने मध्यप्रदेश का उदाहरण देते हुए कहा है कि यहाँ 64 प्रतिशत बच्चों को डायरिया का इलाज मिला लेकिन हमें अभी अन्य बच्चों को भी इस लाभ में शामिल करना है।
जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. के. सुरेश ने इस मौके पर मध्यप्रदेश और भारत में बाल स्वास्थ्य के संदर्भ पर अपना उद्बोधन केन्द्रित किया। उन्होंने कहा कि वर्ष 1968 के बाद से आज तक की स्थिति को हम जानें तो काफी उपलब्धियाँ दर्ज हुई हैं।
जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. के. सुरेश ने इस मौके पर मध्यप्रदेश और भारत में बाल स्वास्थ्य के संदर्भ पर अपना उद्बोधन केन्द्रित किया। उन्होंने कहा कि वर्ष 1968 के बाद से आज तक की स्थिति को हम जानें तो काफी उपलब्धियाँ दर्ज हुई हैं।
लेकिन भारी भरकम चुनौतियाँ आज भी सामने हैं। जहाँ तक स्वास्थ्य ढांचे का सवाल है तो उसमें प्राथमिकताएं एक से दूसरे मुद्दे पर बदलती रहती हैं लेकिन इसके चलते बच्चे को वाजिब तवज्जो नहीं मिल पाती। आज जरूरत यह है कि एक सुव्यवस्थित ढंग से बाल जीवन से जुड़ी समस्याओं का ठोस निदान ढूंढा जाए।
नगरीय स्वास्थ्य संसाधन केन्द्र के श्री सिद्दार्थ अग्रवाल ने कुपोषण की चुनौतियों पर बोलते हुए बताया कि कुपोषण का इलाज इसके बचाव से 27 गुना मंहगा है। उनका मानना था कि बेहतर पोषित बच्चे ही एक बेहतर वयस्क के रूप में विकसित होते हैं और राष्ट्र की तरक्की में योगदान देते है।
नगरीय स्वास्थ्य संसाधन केन्द्र के श्री सिद्दार्थ अग्रवाल ने कुपोषण की चुनौतियों पर बोलते हुए बताया कि कुपोषण का इलाज इसके बचाव से 27 गुना मंहगा है। उनका मानना था कि बेहतर पोषित बच्चे ही एक बेहतर वयस्क के रूप में विकसित होते हैं और राष्ट्र की तरक्की में योगदान देते है।
टाटा एनर्जी रिसर्च इंस्टीट्यूट नई दिल्ली के श्री सखाराम सौमायाजी ने इस मौके पर बच्चों पर प्रभाव डालने वाले पर्यावरणीय विषयों पर प्रकाश डाला। सेमिनार में विभिन्न विषयों के अधिकारी, प्रशिक्षु राजस्व अधिकारी, केन्द्रीय सिविल सेवा के अधिकारी और सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
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