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Monday, November 16, 2009

मप्र में विद्युत उत्पादन क्षमता बढ़कर दुगनी हुई

ऊर्जा मंत्री श्री राजेन्द्र शुक्ल द्वारा केन्द्र से वित्तीय सहायता का अनुरोध
ऊर्जा तथा खनिज साधन राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री राजेन्द्र शुक्ल ने बताया कि मध्यप्रदेश में वर्ष 2003 में 2990 मेगावाट विद्युत उत्पादन क्षमता के मुकाबले अब दुगनी से अधिक 6140 मेगावाट हो गई है। उन्होंने बताया कि आगामी पांच वर्षों में प्रदेश में 7325 मेगावाट क्षमता वृद्धि का कार्यक्रम बनाया गया है।
11वीं पंचवर्षीय योजना में राज्य में 1700 मेगावाट की तीन नई इकाइयां प्रस्तावित हैं। इनमें 1200 मेगावाट की श्री सिंगाजी ताप विद्युत परियोजना तथा कुल 500 मेगावाट की दो विस्तार इकाइयां सतपुड़ा ताप विद्युतगृह में स्थापित की जा रही हैं। श्री शुक्ल ने केन्द्र सरकार से राज्य में विद्युत के क्षेत्र में सुधार तथा विस्तार कार्यों के लिये वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है।
श्री शुक्ल आज नई दिल्ली में केन्द्रीय मंत्री श्री सुशील कुमार शिंदे की अध्यक्षता में आयोजित ऊर्जा मंत्रियों के सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर राज्य के ऊर्जा सचिव श्री एस.पी.एस. परिहार भी मौजूद थे। श्री शुक्ल ने विद्युत क्षेत्र में पूंजीगत कार्यों के लिये राज्य के लिये ऋण आदि की व्यवस्था कार्य हेतु सिंगल विंडो व्यवस्था तथा एक रिसोर्स मोबिलाइजेशन इकाई विद्युत मंत्रालय के अंतर्गत स्थापित करने का सुझाव भी रखा।
श्री शुक्ल ने केन्द्र सरकार से विद्युत वितरण प्रणाली के सुदृढ़ीकरण, 630 मेगावाट की चार पुरानी इकाइयों के नवीनीकरण, फीडर लाईनों को अलग-अलग करने, ग्रामीण क्षेत्रों में वितरण व्यवस्था के सुदृढ़ीकरण तथा विद्युत क्षेत्र में पूंजी निवेश के लिये केन्द्र से वित्तीय एवं विश्व बैंक आदि से ऋण लेने में सहयोग करने का अनुरोध किया। उन्होंने राज्य की विद्युत वितरण कम्पनियों को कम ब्याज दर पर ऋण की व्यवस्था करने को भी कहा।
श्री शुक्ल ने कहा कि मध्यप्रदेश में भी विद्युत की मांग एवं उपलब्धता के अंतर को दूर करने के लिये विद्युत उत्पादन क्षमता वृद्धि के कार्यों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। वर्ष 2013-14 तक प्रदेश में कुल 7325 मेगावाट क्षमता वृद्धि का कार्यक्रम है। राज्य में विद्युत उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ विद्युत निकासी के लिये ट्रांसमिशन प्रणाली के विस्तार एवं सुदृढ़ीकरण के कार्य भी सम्पन्न किये गये हैं।
श्री शुक्ल ने बताया कि मध्यप्रदेश में इन प्रयासों के फलस्वरूप शीर्ष मांग अवधि में अधिकतम 7019 मेगावाट तक की मांग की आपूर्ति सुनिश्चित की गई है। जबकि वर्ष 2002-03 में शीर्ष मांग अवधि में 4652 मेगावाट मांग की आपूर्ति की गई थी। साथ ही प्रदेश में ट्रांसमिशन हानियों का स्तर भी 8.10 प्रतिशत से घटकर 4.09 प्रतिशत हो गया है।
ऊर्जा राज्यमंत्री ने कहा कि नई स्थापित की जा रही विद्युत उत्पादन परियोजनाओं से विद्युत निकासी के लिये ट्रांसमिशन लाईनों तथा ट्रांसमिशन प्रणाली के सुदृढ़ीकरण आदि कार्यों के लिये आगामी पांच वर्षों में लगभग 5816 करोड़ रुपये पूंजी निवेश की आवश्यकता है। श्री शुक्ल ने कहा कि प्रदेश की सतपुड़ा ताप विद्युतगृह की इकाइयों के नवीनीकरण एवं आधुनीकरण के कार्यों के लिये भी विश्व बैंक से ऋण प्राप्ति के प्रस्ताव पर विद्युत मंत्रालय भारत सरकार से सहयोग अपेक्षित है।
उन्होंने सुझाव दिया कि केन्द्रीय स्तर पर विद्युत मंत्रालय में एक रिसोर्स मोबिलाइजेशन इकाई स्थापित की जाना चाहिये, जो कि राज्यों की पूंजीगत आवश्यकता को देखते हुए धन की व्यवस्था हेतु सलाह दे तथा इसके लिये वित्तीय संस्थानों से सम्पर्क करे।
उन्होंने कहा कि केन्द्रीय स्तर पर इस सिंगल विंडो इकाई द्वारा विद्युत परियोजनाओं के लिये कम ब्याज दरों पर पूंजी की व्यवस्था किया जाना संभव हो सकेगा। श्री शुक्ल ने कहा कि विद्युत क्षेत्र में पूंजीगत कार्यों के लिये राज्य के लिये ऋण आदि की व्यवस्था कार्य हेतु सिंगल विंडो व्यवस्था विद्युत मंत्रालय के अंतर्गत की जाये।
श्री शुक्ल ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में विद्युत प्रदाय में सुधार के लिये तथा विद्युत हानियों में कमी लाने हेतु व्यापक धन की आवश्यकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि पम्पों तथा घरों आदि के लिये एक ही फीडर होने से घरों तथा अन्य व्यावसायिक गतिविधियों के लिये आवश्यक विद्युत प्रदाय किया जाना संभव नहीं हो पा रहा है।
प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में शहरों के समान विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिये वितरण फीडर विभक्तिकरण की योजनाएं तैयार की जा रही हैं। अगले तीन वर्षों में किये जाने वाले इन कार्यों के लिये प्रदेश की तीनों वितरण कम्पनियों को करीब पांच हजार करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी। श्री शुक्ल ने कहा कि इस महत्वपूर्ण कार्य के लिये पूंजी की आवश्यकता को देखते हुए यह आवश्यक है कि भारत सरकार द्वारा वितरण कम्पनियों को कम ब्याज दरों पर वित्तीय संस्थाओं से ऋण की व्यवस्था कराई जाये।
श्री शुक्ल ने कहा कि प्रदेश में विद्युत क्षेत्र सुधार कार्यक्रम प्रारंभ किये जाने के बाद से ही पुनर्गठन के बाद स्थापित वितरण कम्पनियों द्वारा टी एंड सी हानियों में कमी लाने के लिये व्यापक प्रयास किये जा रहे हैं। उन्होंने अपेक्षा की कि केन्द्र सरकार द्वारा शहरी क्षेत्रों के लिये आर-एपीडीआरपी के माध्यम से उपलब्ध कराये जा रहे धन के अतिरिक्त ग्रामीण क्षेत्रों में किये जाने वाले अधोसंरचना विकास कार्यों के लिये विशेष ऋण तथा धन की उपलब्धता कराई जायेगी।
उन्होंने बताया कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते दुष्प्रभाव पर रोक लगाने के उद्देश्य से प्रदेश में अपारम्परिक ऊर्जा स्रोतों के माध्यम से विद्युत उत्पादन क्षमता वृद्धि के लिये भी राज्य सरकार द्वारा विशेष प्रयास किये जा रहे हैं। इस बावत राज्य शासन द्वारा एक प्रोत्साहन नीति भी जारी की गई है। श्री शुक्ल ने कहा कि प्रदेश की पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कम्पनी अंतर्गत 50 कृषि पम्पों को ऊर्जा दक्ष पम्पों से परिवर्तित किया गया था, जिसके परिणामस्वरूप विद्युत खपत में लगभग 30 से 40 प्रतिशत कमी होने के साथ-साथ विद्युत की मांग में भी करीब 40 प्रतिशत की कमी आई है।
श्री शुक्ल ने कहा कि राज्य में ऊर्जा दक्ष पम्पों तथा केपेसिटर आदि के उपयोग पर विद्युत दरों में प्रति यूनिट 45 पैसे तक की छूट भी प्रदान की गई है। ऊर्जा दक्ष पम्पों की लागत सामान्य पम्पों से लगभग डेढ़ गुना होती है, जिस कारण किसान इन पम्पों को खरीदने के लिये उत्सुक नहीं रहते हैं।
श्री शुक्ल ने कहा कि केन्द्र सरकार द्वारा जिस तरह डीजल एवं खाद आदि पर सब्सिडी दी जाती है उसी तरह ऊर्जा द्क्ष पम्पों के क्रय के लिये किसानों को सस्ती दरों पर ऋण उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा सकती है, जिससे किसानों के हित के साथ-साथ विद्युत की खपत में लगभग 30 से 35 प्रतिशत की कमी होने के कारण वितरण कम्पनियों का हित भी संरक्षित होगा।
श्री राजेन्द्र शुक्ल ने देश के समग्र विकास के लिये सुझाव दिया कि जिन राज्यों में विद्युत क्षेत्र में सुधार की ज्यादा संभावनाएं हैं तथा विद्युत हानियां आदि का स्तर राष्ट्रीय स्तर से अधिक है,
उन राज्यों में विद्युत क्षेत्र में पूंजी निवेश के लिये केन्द्र सरकार द्वारा विशेष सहायता की जाये ताकि उन राज्यों द्वारा विद्युत की हानियों में कमी लाने के लिये सार्थक प्रयास किये जा सकें। साथ ही उन्होंने अनुरोध किया कि जिन राज्यों में प्रति उपभोक्ता विद्युत खपत राष्ट्रीय स्तर से कम है उन राज्यों को प्रगतिशील राज्यों के समक्ष लाने के लिये विद्युत क्षेत्र हेतु केन्द्र सरकार द्वारा अतिरिक्त सहायता उपलब्ध कराई जाये।

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