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Monday, November 16, 2009

आदिवासी गांवों में 2010 तक अतिरिक्त 3000 बायोगैस संयंत्र

मध्यप्रदेश ग्रामीण आजीविका परियोजना की पहल
प्रदेश के सूदूर आदिवासी गांवों में अगले वर्ष के अंत तक अतिरिक्त 3000 बायोगैस प्लांट लगेंगे। अब तक परिवारों की मांग के आधार पर 2000 बायो गैस प्लांट लग चुके हैं। बायोगैस प्लांट की उपयोगिता और लाभ को देखते हुए अब वे सभी ग्रामीण परिवार मांग करने लगे हैं जिनके पास पशुधन और साथ ही पानी का साधन हैं। मध्यप्रदेश ग्रामीण आजीविका परियोजना की पहल से पारंपरिक उर्जा स्त्रोतों के लिये उनका रूझान लगातार बढ़ रहा है।अब तक सबसे ज्यादा बायो गैस - 656 शहडोल जिले में लगे हैं। इसके बाद अनूपपुर में 512, धार में 260, बडवानी में 154, डिण्डौरी में 126, मंडला में 125, आलीराजपुर में 63 और श्योपुर में 19 बायोगैस संचालित हैं। शहडोल जिले के ब्यौहारी ब्लाक के पपरेडी गांव ने मात्र नौ माह के कम समय में 53 बायो गैस प्लांट लगाकर रेकार्ड बनाया है। यहां कामता प्रसाद बैस के यहां जनवरी 2009 में पहला बायोगैस प्लांट लगा था। 
इसके फायदों को देखते हुए अब यह आंकड़ा 53 तक पहुंच गया है। ब्यौहारी से 15 किमी दूर पपरेडी ग्राम पंचायत का मुख्यालय है। यहां की जनसंख्या करीब 2000 है जिसमें गोंड, खैरवार और बैसवार जाति के परिवार रहते हैं। बायोगैस लगाने वाले सभी परिवारों के पास औसतन आठ जानवर हैं और खेतों में कुंए हैं।
आजीविका परियोजना ने गांवों में बायोगैस प्लांट की स्थापना, प्रबंधन एवं रखरखाव में प्रशिक्षण की भी शुरूआत की है। अब तक 170 गांव स्तरीय राजमिस़्त्रियों के लिये 18 प्रशिक्षण दिये जा चुके हैं। साथ ही बायोगैस प्लांट का उपयोग करने के लिये 2500 उपयोगकर्ता ग्रामीण महिलाओं को भी प्रशिक्षण दिया गया है। 
ग्रामीण समुदाय और परियोजना के मैदानी अमले के बीच तालमेल बनाने वाले आजीविका मित्रों को भी आधारभूत प्रशिक्षण देकर उन्हें टूल किट दिया गया है ताकि वे स्वयं भी अपनी सेवाएं दे सकें। ऐसे करीब 100 आजीविका मित्र प्रशिक्षण ले चुके हैं। कुछ स्थानों पर महिलाओं के स्व सहायता समूहों ने बायो गैस प्लांट में लगने वाले उपकरणों के ग्राम स्तरीय प्रदाय की जिम्मेदारी लेने में भी रूचि दिखाई है।

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