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Wednesday, November 25, 2009

वृक्ष विहीन पहाड़ियों पर वनीकरण होना चाहिए -सरताज

वन विभाग की परामर्शदात्री समिति की बैठक सम्पन्न
वन मंत्री श्री सरताज सिंह ने वन व्यवस्थापन की प्रक्रिया को तेज करने की आवश्यकता पर बल दिया है। श्री सिंह ने आज यहां विधान सभा में वन विभाग की परामर्शदात्री समिति की बैठक को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि वृक्ष विहीन पहाड़ियों पर वनीकरण के लिए विशेष योजना तैयार की जाना चाहिए।वन मंत्री श्री सिंह ने कहा कि वन व्यवस्थापन की विसंगतियों को दूर करने के साथ ही इसकी प्रक्रिया को तेज किया जाए। इसके लिये नक्शों में आवश्यक सुधार भी किए जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि प्रदेश में 37 लाख हेक्टेयर बिगड़े वन क्षेत्र हैं। इन वृक्ष विहीन वन क्षेत्रों में विशेष योजना तैयार कर वनीकरण की संभावनाएं तलाशी जाना चाहिए। श्री सिंह ने कहा कि प्रदेश के विकास में वन संसाधनों का विशेष महत्व है, अत: वनों के बेहतर प्रबंधन का प्रयास किया जाना चाहिए।
राज्य मंत्री वन श्री जयसिंह मरावी ने बैठक में कहा कि वनों के संरक्षण और विकास के साथ ही वन क्षेत्रों में रहने वालों के विकास के लिये भी मेहनत करना होगी। वनों में रहने वाले विकास की धारा से जुड़े रहें, इस ओर भी ध्यान देना होगा। उन्होंने वन अधिकारियों को वन स्थल पर जाकर कार्य करने की आवश्यकता पर बल दिया।
परामर्शदात्री समिति के सदस्यों ने बैठक में सुझाव दिये कि वनाधिकार पट्टे मिलने के बाद, ऐसे गांवों के विकास के लिये स्वच्छ पेयजल, सड़क तालाब निर्माण आदि कार्य होने चाहिये। इन कार्यों में वन विभाग सहयोग करें। वन वृक्षारोपण कार्यों की देखरेख की व्यवस्था दस साल तक हो। बांस रोपण पर विशेष ध्यान दिया जाय। 
जो किसान बांस रोपण के इच्छुक है, उन्हें प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। खरगोन, बड़वानी, धार, झाबुआ एवं अन्य जिलों की खुली पहाड़ियों पर रतनजोत एवं अन्य ऐसी प्रजातियों का रोपण किया जाये, जिन के उत्पादन से स्थानीय निवासियों को स्थाई रोजगार भी मिल सके।
परामर्शदात्री समिति सदस्यों ने कहा कि वन्यप्राणियों द्वारा क्षति पहुंचाने पर क्षतिपूर्ति प्रकरण के लिये प्रक्रिया सरल होनी चाहिये। प्रभावित व्यक्ति को वन-राजस्व कार्यालयों में भटकना न पड़े और उसे यथासम्भव शीघ्र क्षतिपूर्ति प्राप्त हो। तेन्दूपत्ता संग्राहक की मृत्यु होने पर उसके परिवार को तत्काल ही बीमा का लाभ प्राप्त हो, ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिये। वन संरक्षण के लिये उत्कृष्ट कार्य करने वाली ग्राम वन समितियों को पुरस्कृत किया जाना चाहिये। 
वन क्षेत्रों में बने प्राचीन देवालयों के संरक्षण एवं सुधार की अनुमति देने पर विचार किया जाय। मण्डला जिला मुख्यालय के पास बिछिया में कान्हा राष्ट्रीय उद्यान के गेट का निर्माण हो और वहां स्थित तालाब में नौकायन की व्यवस्था के साथ ही इस क्षेत्र में पर्यटन सुविधाएं विकसित की जायें। काष्ठ व्यापार अधिनियम 1973 का सरलीकरण हो ताकि छोटे व्यापारी भी लाभ प्राप्त कर सकें।
अभ्यारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों में बसे वनवासियों की स्थिति बेहतर करने के प्रयास हो। प्रतिबन्धात्मक नियमों का सरलीकरण हो। सिंग्रामपुर-तेजगढ़ वन परिक्षेत्र में इको टूरिज्म सेन्टर विकसित किया जाये। नौरादेही वन्यप्राणी अभ्यारण्य के कुछ गांवों को अभ्यारण्य की सीमारेखा से बाहर किया जाये और कुछ गांवों को अन्य वन मण्डल में शामिल किया जाये तथा कुछ गांवों को डि-नोटीफाई किया जाये।
बैठक में अपर मुख्य सचिव वन श्री प्रशांत मेहता ने बताया कि वनों के सुधार एवं विकास की प्रक्रिया से जुड़े विषयों पर विभाग द्वारा दिसम्बर माह में मंथन कार्यक्रम शुरू किया जा रहा है। इस कार्यक्रम में रेंज, वन मण्डल, वन संरक्षण एवं मुख्यालय स्तर पर विचार किया जायेगा और प्रक्रिया सरलीकरण पर भी विचार होगा। वन-राजस्व सीमा विवाद पर ध्यान दिया जायेगा। वन क्षेत्र से 5 कि.मी. परिधि में जलाऊ लकड़ी एवं चारागाह विकास के लिये रोपण कार्यक्रम लिया जायेगा। अगले वर्ष को बांस रोपण वर्ष के रूप में मनाया जायेगा।
मेहता ने बताया कि बैगा जनजाति को भी बसोर जाति की तरह बांस लेने की अनुमति दी गई है। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय उद्यानों/अभ्यारण्यों में आने वाले 117 गांवों को टापू बनाकर राजस्व ग्राम में परिवर्तित करने और वनों के किनारे वाले गांवों को वन सीमा से बाहर करने के लिये उच्चतम न्यायालय में प्रतिवेदन प्रस्तुत किया है।
श्री मेहता ने बताया कि विभाग ने वनाधिकार अधिनियम के तहत पट्टे देने के कार्य में पूरा सहयोग किया है। विभाग के पास उपलब्ध वन क्षेत्र वासियों की सूची जिला कलेक्टरों को उपलब्ध कराई गई। वन ग्रामों को राजस्व ग्रामों में परिवर्तित करने की प्रक्रिया उक्त अधिनियम में हैं। उन्होंने बताया कि वन ग्रामों के विकास की योजना का क्रियान्वयन किया जा रहा है।
प्रमुख वन संरक्षक श्री ए.के. दुबे ने बताया कि मध्यप्रदेश का वन विभाग स्थापना के 150 वर्ष पूरे करने जा रहा है। देश में 1897 में सबसे पहले होशंगाबाद में वर्किंग प्लान बना था। समय के साथ-साथ, प्रदेश में नई संरचनाएं लागू की गई। प्रदेश के वर्किंग प्लान की विभिन्न राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा हुई है।
प्रदेश में 334 वन चौकियां स्थापित है और नई चौकियां बनाई जा रही है। बन्दूक-रिवाल्वर क्रय किये है और इनके उपयोग के अधिकार केन्द्र से प्राप्त किये हैं। प्रदेश के फायर अलर्ट मैसेजिंग सिस्टम की राष्ट्र स्तर पर प्रशंसा की गई है। प्रदेश के वन क्षेत्रों में बिगड़े वनों का सुधार कार्य किया जा रहा है।देश में ऊर्जा वन, विद्यावन, चारागाह विकास, माई-सिटी-ग्रीन सिटी एवं हरियाली योजना लागू की गई है। प्रदेश में 15 हजार 228 वन समितियां वन प्रबन्धन में सहयोग कर रही है।
बैठक में परामर्शदात्री समिति के सदस्य विधायक सर्वश्री रत्नेश सालोमन, नारायण सिंह पट्टा, भगत सिंह नेताम, अंतर सिंह आर्य, अल्केश आर्य, लक्ष्मण तिवारी, म.प्र. राज्य लघु वनोपज संघ के प्रबन्ध संचालक श्री आर.के. दवे, प्रधान मुख्य वनसंरक्षक (वन्यप्राणी) श्री आर.एस. नेगी, प्रधान मुख्य वनसंरक्षक (कार्य आयोजना) डॉ. एस. पाबला, ईको पर्यटन विकास बोर्ड की मुख्य कार्यपालन अधिकारी डॉ. गोपा पाण्डेय तथा सचिव वन श्री रतन पुरवार सहित वरिष्ठ वन अधिकारी उपस्थित थे।

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