“न्यायालय की अवमानना अधिनियम’' कार्यशाला
कानून का शासन स्थापित करने के लिये न्यायालयीन आदेशों का पालन किया जाये। भले ही ऐसे आदेश से आप असहमत भी हों, उन्हें जब तक वैधानिक उपचार के माध्यम से स्थगित ना कर लिया जाये, उनका पालन हो।
इस आशय के उद्गार आज यहां आर.सी.व्ही.पी. नरोन्हा प्रशासन अकादमी में “न्यायालय की अवमानना अधिनियम’' कार्यशाला को भारत के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री जे.एस. वर्मा ने अपने संबोधन में व्यक्त किये। कार्यक्रम में राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय,भोपाल के संचालक श्री एस.एस. सिंह, प्रमुख सचिव विधि विभाग श्री एन.के. गुप्ता, उच्च न्यायालय दिल्ली के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री आदित्य मदान, प्रशासन अकादमी महानिदेशक डॉ. संदीप खन्ना एवं संचालक श्री एम.के. वार्ष्णेय के अलावा अखिल भारतीय सेवा के प्रशिक्षु अधिकारी, प्रशिक्षु सहायक जिला अभियोजन अधिकारी आदि उपस्थित थे।
न्यायमूर्ति श्री वर्मा ने कहा कि शासन की ओर से पेश की जाने वाली अपीलें समयबाधित होती है, अत: उनमें तत्परता पूर्वक कार्यवाही की जानी चाहिये। न्यायाधीशों को न्याय का सम्मान करना चाहिये और व्यक्तिगत हितों को न्याय के आड़े नहीं आने देना चाहिये।
न्यायमूर्ति श्री वर्मा ने कहा कि शासन की ओर से पेश की जाने वाली अपीलें समयबाधित होती है, अत: उनमें तत्परता पूर्वक कार्यवाही की जानी चाहिये। न्यायाधीशों को न्याय का सम्मान करना चाहिये और व्यक्तिगत हितों को न्याय के आड़े नहीं आने देना चाहिये।
उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19(1) में विचार प्रकट करने की स्वतंत्रता सभी को दी गयी है। परन्तु संविधान के अनुच्छेद 19 (2) में इस स्वतंत्रता में कुछ उपयुक्त प्रतिबंध भी लगाये गये हैं । कोई प्रतिबंध उपयुक्त है या नहीं, इसका निर्णय न्यायपालिका को करना है।
परन्तु विचारों की स्वतंत्रता की आड़ में न्यायपालिका की अनावश्यक अवमानना नहीं की जा सकती। श्री वर्मा ने बताया कि भारतीय न्यायपालिका समूचे विश्व में शाक्तिशाली है, जिसकी सर्वोच्चता बनाये रखने की जिम्मेदारी देश के समस्त नागरिकों की है।
राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के संचालक श्री सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय न्यायपालिका के पास तलवार या पैसे की नहीं पेन (कलम) की ताकत होती है। न्यायदान की कार्यवाही हेतु कार्यपालिका का सहयोग आवश्यक है। न्यायदान में आने वाली रूकावटों को दूर करने के लिये न्यायपालिका के पास “अवमानना” रूपी एक प्रमुख अधिकार है, जिसका सोच समझकर उपयोग होना चाहिये।
दिल्ली उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री मदान ने कार्यशाला को संबोधित करते हुये कहा कि अवमानना की स्थिति न्यायालय के आदेशों का पालन न करने से निर्मित होती है। या तो ये आदेश संबंधित को बतलाये नहीं जाते अथवा जानबूझकर आदेश का पालन नहीं किया जाता है।
राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के संचालक श्री सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय न्यायपालिका के पास तलवार या पैसे की नहीं पेन (कलम) की ताकत होती है। न्यायदान की कार्यवाही हेतु कार्यपालिका का सहयोग आवश्यक है। न्यायदान में आने वाली रूकावटों को दूर करने के लिये न्यायपालिका के पास “अवमानना” रूपी एक प्रमुख अधिकार है, जिसका सोच समझकर उपयोग होना चाहिये।
दिल्ली उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री मदान ने कार्यशाला को संबोधित करते हुये कहा कि अवमानना की स्थिति न्यायालय के आदेशों का पालन न करने से निर्मित होती है। या तो ये आदेश संबंधित को बतलाये नहीं जाते अथवा जानबूझकर आदेश का पालन नहीं किया जाता है।
अवमानना से बचने के लिये प्रभारी अधिकारी अपने सरकारी वकील से सतत संपर्क बनाये रखें। इंटरनेट के माध्यम से अब हाई कोर्ट के आदेशों की जानकारी अब प्रभारी अधिकारी ले सकते हैं। उन्होंने कहा कि प्रभारी अधिकारी (ओ.आई.सी.) सरकारी वकील को तथ्यात्मक सही जानकारी दें। प्रमुख सचिव विधि विभाग श्री गुप्ता ने भी न्यायालय की अवमानना से बचने के लिये प्रभारी अधिकारियों को आदेशानुसार समय पर सही जानकारी कोर्ट में प्रस्तुत करने का परामर्श दिया।
प्रारंभ में अकादमी महानिदेशक डॉ. खन्ना ने कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों एवं प्रशिक्षु अधिकारियों का स्वागत करते हुये कार्यशाला आयोजन के उद्देश्य पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि विख्यात विधि विशेषज्ञों के परामर्श अनुसार प्रशिक्षु अधिकारी भविष्य में प्रभारी अधिकारी के रूप में कार्यवाही करके न्यायालय की अवमानना से बच सकेंगे। इस अवसर पर संचालक लोक अभियोजन श्री एन.के. गर्ग, संकाय सदस्य डॉ. नजमी एवं श्री भारद्वाज उपस्थित भी थे।
प्रारंभ में अकादमी महानिदेशक डॉ. खन्ना ने कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों एवं प्रशिक्षु अधिकारियों का स्वागत करते हुये कार्यशाला आयोजन के उद्देश्य पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि विख्यात विधि विशेषज्ञों के परामर्श अनुसार प्रशिक्षु अधिकारी भविष्य में प्रभारी अधिकारी के रूप में कार्यवाही करके न्यायालय की अवमानना से बच सकेंगे। इस अवसर पर संचालक लोक अभियोजन श्री एन.के. गर्ग, संकाय सदस्य डॉ. नजमी एवं श्री भारद्वाज उपस्थित भी थे।
0 comments:
Post a Comment