बौद्ध विचार और संस्कृति पर केन्द्रित उत्सव
अनुसूचित जाति कल्याण विभाग और मध्यप्रदेश पर्यटन के सहयोग से संस्कृति विभाग और मध्यप्रदेश पर्यटन के सहयोग से संस्कृति विभाग द्वारा कलाओं में बौद्ध विचार और संस्कृति पर केन्द्रित उत्सव 'सम्बोधि' का आयोजन 29 नवम्बर से 1 दिसम्बर, 2009 तक सांची में किया जा रहा है।संस्कृति संचालक श्री श्रीराम तिवारी ने बताया कि मध्यप्रदेश के रायसेन जिले में स्थित प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थ स्थल सांची में भारत के अलावा तिब्बत, चीन, जापान, कोरिया, ताईवान और श्रीलंका आदि देशों से प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में पर्यटक आते हैं। साँची उसके स्तूपों, संघागारों (विहार), मंदिरों और स्तम्भों के कारण विश्व प्रसिद्ध है, जिनका निर्माण ईस्वी पूर्व तीसरी सदी से ईस्वी सन् 12 वीं सदी तक हुआ। इन स्मारकों में सबसे प्रसिद्ध सांची स्तूप क्रमांक – एक है, जिसका निर्माण मौर्य सम्राट अशोक ने किया था।
सम्राट अशोक की पत्नी पड़ोसी विदिशा जनपद के एक श्रेष्ठी की कन्या थी। यहाँ निकट ही एक आधुनिक बौद्ध मंदिर है, जिसकी मंजूषा में सांची के बाहर के स्तूप में पाये गये बौद्ध गुरूओं के अवशेष रखे हुये हैं। साँची के स्तूप विश्व धरोहर हैं।
बौद्ध धर्म का जन्म भारत भूमि पर हुआ। महात्मा बुद्ध ने मध्यमार्ग अपनाते हुए अहिंसा युक्त दस शीलों का प्रचार किया। बौद्ध धर्म ने सबको समान मानकर आपसी एकता की बात की। भारतीय पवित्र भूमि पर उदभूत विचारों में से बौद्ध विचार और दर्शन ही संभवत: भारत भूमि को लांघकर दुनिया के अन्य देशों तक सबसे पहले यात्रा कर पाया है। आज भी इस धर्म की मानवतावादी, बुद्धिवादी और उदारतापूर्ण परिकल्पनाओं को नकारा नहीं जा सकता।
महात्मा बुद्ध की देशणाओं में सबसे अहम और केन्द्रीय देशणा मध्यमार्ग की है। बुद्ध 2700 सौ वर्ष पूर्व इसी धरती पर पैदा हुए हैं। मध्यमार्ग की उनकी प्रस्तावना आज भी प्रासंगिक है। भारतीय मानस किसी भी क्षेत्र की अति को स्वीकार नहीं करता। अति के गर्व से कला परम्पराएँ जन्म नहीं ले सकती। अतियाँ भी समाज, समुदाय या व्यक्ति विशेष का विचार होते हैं लेकिन कोई भी अति अनन्त काल तक यात्रा नहीं कर पाती।
बौद्ध धर्म का जन्म भारत भूमि पर हुआ। महात्मा बुद्ध ने मध्यमार्ग अपनाते हुए अहिंसा युक्त दस शीलों का प्रचार किया। बौद्ध धर्म ने सबको समान मानकर आपसी एकता की बात की। भारतीय पवित्र भूमि पर उदभूत विचारों में से बौद्ध विचार और दर्शन ही संभवत: भारत भूमि को लांघकर दुनिया के अन्य देशों तक सबसे पहले यात्रा कर पाया है। आज भी इस धर्म की मानवतावादी, बुद्धिवादी और उदारतापूर्ण परिकल्पनाओं को नकारा नहीं जा सकता।
महात्मा बुद्ध की देशणाओं में सबसे अहम और केन्द्रीय देशणा मध्यमार्ग की है। बुद्ध 2700 सौ वर्ष पूर्व इसी धरती पर पैदा हुए हैं। मध्यमार्ग की उनकी प्रस्तावना आज भी प्रासंगिक है। भारतीय मानस किसी भी क्षेत्र की अति को स्वीकार नहीं करता। अति के गर्व से कला परम्पराएँ जन्म नहीं ले सकती। अतियाँ भी समाज, समुदाय या व्यक्ति विशेष का विचार होते हैं लेकिन कोई भी अति अनन्त काल तक यात्रा नहीं कर पाती।
बुद्ध के विचार इन अर्थों में अनूठे और अद्वितीय हैं कि उन्होंने प्रत्येक क्षेत्र में पावित्र और सत्याचरण पर बल दिया। शांति, सौहार्द्र और भाईचारे की मूल अवधारणा ही संस्कृति और कला के विविध रूपों में अपने को अभिव्यकत करती है।
विश्व शांति और परस्पर भाईचारे का वातावरण निर्मित करने तथा सांची के विश्व प्रसिद्ध महत्व और देशी-विदेशी पर्यटकों की संख्या को दृष्टिगत रखते हुए तीन दिवसीय बौद्ध महोत्सव आयोजित किया जा रहा है। समारोह में बौद्ध विचार, दर्शन पर आधारित प्रदर्शनकारी कलारूपों के अलावा विशेष रूप से नृत्य नाटिकाएँ तैयार कराई जाकर प्रस्तुतियाँ कराई जा रही हैं।
विश्व शांति और परस्पर भाईचारे का वातावरण निर्मित करने तथा सांची के विश्व प्रसिद्ध महत्व और देशी-विदेशी पर्यटकों की संख्या को दृष्टिगत रखते हुए तीन दिवसीय बौद्ध महोत्सव आयोजित किया जा रहा है। समारोह में बौद्ध विचार, दर्शन पर आधारित प्रदर्शनकारी कलारूपों के अलावा विशेष रूप से नृत्य नाटिकाएँ तैयार कराई जाकर प्रस्तुतियाँ कराई जा रही हैं।
भारत के अलावा अन्य देशों के बौद्ध प्रदर्शनकारी कलारूपों को भी आमंत्रित किया जा रहा है। इस वर्ष भारतीय राज्यों से खासतौर से उत्तर पूर्व के राज्यों तथा हिमाचल प्रदेश और छत्तीसगढ़ स्थित बौद्ध विहार से प्रदर्शनकारी नृत्य प्रस्तुतियों को आमंत्रित किया जा रहा है। भगवान बुद्ध पर आधारित नृत्य नाटिका की प्रस्तुति की जा रही है।
बौद्ध परम्परा में विविध प्रकार के यंत्रों, मण्डलों तथा मुखौटों का सृजन अत्यन्त कलात्मकता से किया जाता है। ऐसे चित्रों की प्रतिकृतियाँ अथवा मूल चित्रों की तीन दिवसीय प्रदर्शनी भी संयोजित की जा रही है। मध्यप्रदेश में प्राप्त बोद्ध प्रतिमाओं तथा अवशेषों की प्रदर्शनी भी विशेष रूप से लगाई जा रही हैं।
बौद्ध परम्परा में विविध प्रकार के यंत्रों, मण्डलों तथा मुखौटों का सृजन अत्यन्त कलात्मकता से किया जाता है। ऐसे चित्रों की प्रतिकृतियाँ अथवा मूल चित्रों की तीन दिवसीय प्रदर्शनी भी संयोजित की जा रही है। मध्यप्रदेश में प्राप्त बोद्ध प्रतिमाओं तथा अवशेषों की प्रदर्शनी भी विशेष रूप से लगाई जा रही हैं।
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