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Tuesday, December 1, 2009

संस्कृति मंत्री श्री शर्मा द्वारा संबोधि समारोह का शुभारंभ

 नृत्य गतियों में मुखरित हुए बुद्ध संदेश
समता और एकता की कलात्मक बानगियों के साथ विश्व बन्धुत्व का सनातन संदेश देता महात्मा बुद्ध का जीवन दर्शन, बीती शाम साँची के मुक्ताकाश मंच पर जीवंत हुआ। साँची में इस तीन दिवसीय उत्सव का शुभारंभ प्रदेश के जनसम्पर्क एवं संस्कृति मंत्री श्री लक्ष्मीकांत शर्मा द्वारा किया गया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि साँची महोत्सव को और भव्यता प्रदान की जाएगी तथा आगामी वर्ष यह महोत्सव अंतर्राष्ट्रीय महोत्सव के रूप में मनाया जाएगा।
अनुसूचित तथा जनजाति कल्याण विभाग, पर्यटन विकास निगम और जिला प्रशासन रायसेन के सहयोग से संस्कति विभाग द्वारा परिकल्पित तीन दिवसीय संबोधि समारोह की पहली शाम सिक्किम, इंडोनेशिया, हिमाचल प्रदेश, त्रिपुरा, अरूणाचल, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के पारंपरिक तथा जनजातीय नृत्यों की बहुरंगी प्रस्तुतियों में बौद्ध विचारों को नए शिल्प सौन्दर्य और रूपकों में देखना दर्शकों के लिए ऐतिहासिक अनुभव था। उल्लेखनीय है कि संस्कृति विभाग के आमंत्रण पर देश-विदेश के सैकड़ों कलाकार अपने जीवन और संस्कृति में सदियों से कायम अमन, एकता तथा आपसदारी को अभिव्यक्त करने बौद्ध तीर्थ साँची आए हैं। इस गरिमामय समारोह का सूत्र संचालन कला समीक्षक श्री विनय उपाध्याय ने किया।
सभा की शुरूआत हिमाचल प्रदेश के बौद्ध मठों में प्रचलित नृत्य छमक छाम से हुई। काली टोपी और शरीर पर चटख रंगों से लदकर परिधान धारण किए भिक्षुगणों ने इस नृत्य के रूप में सामाजिक समरसता और विश्व कल्याण की कामनाओं को अभिव्यक्त किया। छमक छाम हिमाचल के बौद्ध अनुयायियों का धार्मिक नृत्य है जो कि गुंटुर फेस्टिवल तथा चरबर मेले के दौरान किया जाता है। इस नृत्य के पाठ का अनुष्ठान और नृत्य की उल्लिखित प्रस्तुतियां पूरे वातावरण में पवित्रता का संचार करती हैं।
सिक्किम के कला दल ने जीवन में मृत्यु के प्रसंग को सिंग याम छम नृत्य में अभिव्यक्त किया जो दरअसल मुखौटा नृत्य है। मान्यता है कि मृत्यु के बाद आत्मा के सदमार्ग पर गतिमान होने तथा पुण्य कार्य करने की कामना इस नृत्य में मुखरित होती है। शहनाई जैसा सुधिर वाद्य और बड़े ड्रम के आकार का लाल वाद्य अपनी लयकारी से इस नृत्य को और भी मनभावन बना देता है।
बुद्ध की वैचारिक चेतना को अंगीकार करता तिब्बतियों का पारम्परिक नृत्य छाला छिरिंग जितना आकर्षक अपने रूपों और विन्यास को लेकर बन पड़ा, उतना ही भावपूर्ण अपनी भीतरी पैठ के कारण इस कला रूप में कलाकारों ने अपने पारम्परिक पहनावे को भी प्रकट किया।

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