"मध्यप्रदेश में बच्चों की स्थिति-2009" पुस्तक का विमोचन
Bhopal:Saturday, October 24, 2009:Updated 16:47IST म.प्र. मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष श्री जस्टिस डी.एम. धर्माधिकारी ने कहा है कि राज्य में बच्चों की स्थितियों पर विचार करते समय बालिकाओं की घटती संख्या को रोकने की ओर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है। लिंग अनुपात में असंतुलन से समाज को काफी कठिनाईयों का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि बुंदेलखंड अंचल में कन्या लिंग अनुपात तेजी से नीचे गिर रहा है। श्री धर्माधिकारी ने यह बात आज यहां मध्यप्रदेश बाल अधिकार पर्यवेक्षक मंच द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'मध्यप्रदेश में बच्चों की स्थिति-2009' का विमोचन करने के अवसर पर कही।
इस अवसर पर बाल अधिकार पर्यवेक्षक मंच की अध्यक्ष श्रीमती निर्मला बुच, महिला और बाल विकास विभाग की प्रमुख सचिव श्रीमती टीनू जोशी, यूनिसेफ के राज्य प्रमुख डॉ। हामिद एल. बशीर, डॉ. श्रीमती शीला भम्भल तथा बाल कल्याण के क्षेत्र में कार्यरत एनजीओज के पदाधिकारी उपस्थित थे।
जस्टिस धर्माधिकारी ने कहा कि राज्य के उत्तरी भाग और बुंदेलखंड क्षेत्र में बिगड़ते लिंग अनुपात की रोकथाम की जानी चाहिये। इसके लिये एनजीओज को प्रशासनिक अधिकारियों से सहयोग कर ऐसे लिंग परीक्षण केन्द्रों पर निगरानी रखनी चाहिये जो इस कानून का पालन नहीं कर रहे हैं।
इस संबंध में श्री धर्माधिकारी ने एक वर्ष पहले जबलपुर कलेक्टर द्वारा लिंग परीक्षण केन्द्रों के लिये किये गये स्टिंग आप्रेशन प्रणाली का उल्लेख किया तथा कहा कि ऐसे तरीके अन्य जिलों में भी अपनाये जाने चाहिये। उन्होंने कहा कि कन्या शिशु के साथ भेदभाव करना सभ्य समाज के लिये शर्मनाक है।
उन्होंने कहा कि राज्य शासन ने संस्थागत प्रसूति को प्रोत्साहन दिया है, यह स्वागत योग्य कदम है, लेकिन इसके लिये अस्पतालों में बुनियादी सुविधाएं बढ़ाना बहुत आवश्यक है। श्री धर्माधिकारी ने कहा कि आयोग के पदाधिकारियों द्वारा कुछ समय पहले अस्पतालों का सर्वेक्षण करने पर ज्ञात हुआ कि अस्पतालों में संस्थागत प्रसूति के लिये अपेक्षित सुविधाएं व स्टाफ पर्याप्त मात्रा एवं संख्या में उपलब्ध नहीं है।
जस्टिस धर्माधिकारी ने कहा कि देशकाल की वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए साक्षरता प्रसार में प्रायवेट पब्लिक पार्टिसीपेशन पद्धति को अपनाना अच्छा होगा। उन्होंने कहा कि दूसरे राज्यों की तुलना में मध्यप्रदेश में बाल अपराध का प्रतिशत अधिक है।
जो बच्चे बाल संप्रेक्षण गृहों में आते हैं उनसे पूछताछ में यह स्पष्ट हो जाता है कि उन्हें प्रेम की कमी है। उनकी पारिवारिक स्थितियां ऐसी होती हैं कि वे अपने ही परिवार में काफी उपेक्षित रहते हैं। उन्होंने कहा कि बाल संप्रेक्षण गृहों का संचालन भी व्यवस्थित ढंग से होना चाहिये। वहां पर आवश्यक हो तो मनोवैज्ञानिकों की पदस्थापना भी की जाना चाहिये।
म.प्र. बाल अधिकार पर्यवेक्षक मंच की अध्यक्ष श्रीमती निर्मला बुच ने कहा कि उनके द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक बाल विकास के क्षेत्र में कार्यरत अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों, सरकारी विभाग, स्वयंसेवी संगठनों और समाजसेवी संस्थाओं को मध्यप्रदेश में बाल अधिकारों की स्थितियों की आधारभूत जानकारियां उपलब्ध करायेगी।
श्रीमती बुच ने कहा कि पुस्तक में बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा, जीवनरक्षा, बाल विकास की स्थितियों और नीतियों, पोषण आहार आदि की तथ्यात्मक जानकारियां संकलित कर छापी गई हैं। उन्होंने कहा कि राज्य में अभी भी शिशु मृत्यु दर अधिक है। बाल संरक्षण के क्षेत्र में कार्यरत एजेंसियों को राज्य के उन क्षेत्रों की भी जानकारी मिल सकेगी जहां कुपोषण अधिक संख्या में है।
उन्होंने कहा कि यह पुस्तक सरकार और अन्य संबद्ध एजेंसियों के लिये दृष्टि (विजन) बनाने के काम आयेगी। उन्होंने कहा कि कुपोषण की स्थितियां यदि किसी क्षेत्र विशेष में उत्पन्न होती हैं तो उससे निपटने की कार्यवाही राज्य के मुख्यालय से क्यों होनी चाहिये उसके लिये तो स्थानीय तौर पर ही ऐसी सक्षम संस्थाएं होनी चाहिये जो अपने क्षेत्र की समस्याओं का निराकरण करें। इसके लिये सामुदायिक सहभागिता की अवधारणा पर काम करना होगा। उन्होंने कहा कि प्रत्येक जिले में बाल अधिकार मंच का गठन होना आवश्यक है।
यूनिसेफ के राज्य प्रमुख श्री हामिद एल. बशीर ने कहा कि मध्यप्रदेश बाल अधिकार पर्यवेक्षक मंच द्वारा छापी गई पुस्तक से बच्चों की समस्याओं पर जनचर्चा होगी और उससे निकलने वाले निष्कर्षों से बाल विकास के कार्यक्रमों के कार्यान्वयन में तेजी आयेगी।
उन्होंने कहा कि बालकों के अधिकार केवल सरकार की चिंता का विषय नहीं है यह एक सामाजिक आंदोलन है जिसमें एक जीवंत समाज जुड़कर अपनी भावी पीढ़ी को मजबूती दे सकेगा। उन्होंने कहा कि यह मंच केवल मध्यप्रदेश ही नहीं अन्य राज्यों के लिये भी मार्गदर्शक बनेगा।
श्री बशीर ने कहा कि वे मध्यप्रदेश में गत तीन वर्षों से काम कर रहे हैं और उन्हें यह स्वीकार करने में कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि बाल अधिकार के मामले में पूर्व की तुलना में यह राज्य अधिक जानकारीयुक्त हो गया है। उन्होंने कहा कि स्थानीय संस्थाएं अपने लक्ष्यों और उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिये वचनबद्ध हैं।
महिला एवं बाल विकास विभाग की प्रमुख सचिव श्रीमती टीनू जोशी ने कहा कि बाल विकास के लिये उपलब्ध डाटाबेस को बिन्दुवार अलग-अलग देखने की आवश्यकता है। राज्य शासन ने महिला सशक्तिकरण, सुशासन, बाल साक्षरता और स्वास्थ्य के क्षेत्रों में निचले क्षेत्रों से काम करना शुरू किया है।
कुपोषण और बच्चों की मृत्यु दर को कम करने में भी काफी सफलता मिली है। उन्होंने जानकारी दी कि स्वास्थ्य विभाग से समन्वय स्थापित कर गांवों में स्वच्छता अभियान चलाने का काम शुरू किया जायेगा तथा विभाग की सेवाओं के प्रदाय की स्थितियों का सोशल आडिट करवाकर इस बात की जानकारी ली जायेगी कि सरकारी योजनाओं का लाभ कितने बड़े समूह तक पहुंच पाया है। उन्होंने कहा कि बाल अधिकार के मामले में सरकार का रुख सकारात्मक है और इस क्षेत्र में मिलने वाले उपयोगी सुझावों पर विचार किया जायेगा।
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