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Monday, October 26, 2009

विद्यार्थियों के अभिक्षमता परीक्षण में जुटे हायर सेकेंडरी स्कूल

स्वामी विवेकानंद कॅरियर मार्गदर्शन योजना
प्रदेश के सभी शासकीय हायर सेकेंडरी स्कूल में आज से कक्षा 12 वीं में अध्ययनरत छात्रों का स्वामी विवेकानंद कॅरियर मार्गदर्शन योजना के अंतर्गत मनौवैज्ञानिक परीक्षण प्रारंभ हो गया।
इस हेतु सभी विद्यार्थियों के मध्य वितरित किये जाने वाले पपत्रों को जिला शिक्षा अधिकारी के माध्यम से प्रदेश के सभी हायर सकेडरी स्कूलों तक पहुँचा दिया गया हैं। इन प्रपत्रों के मूल्यांकन के लिए शिक्षकों को काउंसलर मैनुअल दिया गया है।
जिसकी सहायता से इन प्रपत्रों का मूल्यांकन एवं परीक्षण होगा। विद्यार्थियों को प्राप्त प्राप्तांकों के आधार पर संस्था के कॅरियर काउॅसलर उन्हें कॅरियर परामर्श देंगे।
विद्यार्थियों के मनोवैज्ञानिक परीक्षण के लिए मुद्रित प्रपत्र में संचयी कॅरियर काउंसलर प्रपत्र, व्यवहारिक सूची प्रपत्र, व्यक्ति परीक्षण आदि विद्याओं का समावेश किया गया है। इन प्रपत्रों में विद्यार्थी की व्यक्तितगत जानकारी के अलावा पारिवारिक जानकारी, स्वास्थ्य संबंधी मूल्यांकन, व्यक्तिगत विशेषताओं का मूल्यांकन, पाठ्यतर गतिविधियों की जानकारी, छात्र के भविष्य की योजनाएं और समय-समय पर कॅरियर काउंसलर द्वारा दी गई जानकारी के साथ ही व्यावसायिक अभिरुचि के परीक्षण के माध्यम से उसे व्यापार, प्रबंधन, प्रशासन, जनसंचार तथा शिक्षा एवं प्रशिक्षण, स्वास्थ्य विज्ञान, एवं प्रौद्योगिकी, विधि संग्रहालय एवं पुरातत्व विज्ञान, कृषि एवं खाद तथा समाजसेवा आदि के क्षेत्र में प्रविष्ट होने के लिए योग्यता का ऑकलन कर कॅरियर मार्गदर्शन दिया जाएगा।
इसके अलावा विद्यार्थी के व्यक्तित्व का परीक्षण कर यह भी ज्ञात किया जाएगा कि वह अंर्तमुखी, बाह्यमुखी अथवा उभयमुखी है, जिसके आधार पर विद्यार्थी को कॅरियर की दिशाएँ बताई जाएंगी।
उल्लेखनीय है कि समस्त कॅरियर काउंसलर को प्रशिक्षण देने के लिए प्रथम चरण में गत 7 एवं 18 जनवरी को तथा द्वितीय चरण में सेटकॉम के माध्यम से 24 अक्टूबर को प्रशिक्षित किया जा चुका है। सेटकॉम प्रशिक्षण कार्यक्रम में आयुक्त, उच्च शिक्षा श्री आशीष उपाध्याय, योजना के निदेशक डॉ. पंकज त्रिवेदी एवं उपनिदेशक डॉ. पुरुषोत्तम दुबे आदि ने प्रशिक्षण दिया था।

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Sunday, October 25, 2009

कॅरियर काउंसलर्स को मनौवैज्ञानिक परीक्षण में प्रशिक्षण

प्रशिक्षण में तैतीस जिलों के काउंसलर्स ने भाग लिया
Bhopal:Saturday, October 24, 2009:Updated 20:00IST प्रदेश के हायर सेकेंडरी स्कूलों के कॅरियर काउंसलर्स को आज विद्यार्थियों के मनोवैज्ञानिक परीक्षण के संबंध में सेटकॉम के जरिए प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण के दौरान उच्च शिक्षा आयुक्त श्री आशीष उपाध्याय, स्वामी विवेकानंद कॅरियर योजना के संचालक श्री पंकज त्रिवेदी भी उपस्थित थे।
प्रशिक्षण में तैतीस जिलों के काउंसलर्स ने भाग लिया। इनमें हायर सेकेंडरी स्कूलों के प्राचार्य और व्याख्याता शामिल थे। प्रशिक्षण में विशेषज्ञों द्वारा उन्हें छात्रों के मनौवैज्ञानिक परीक्षण के संबंध में प्रशिक्षण दिया गया। इस मौके पर डॉ. डी.सी. राठी, डा. पुरूषोत्तम दुबे, संयुक्त संचालक लोक शिक्षण श्री के.के. पाण्डे आदि ने प्राचार्यों और व्याख्याताओं को विभिन्न पहुलओं से अवगत कराया।

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Friday, July 31, 2009

खुद की शख्सियत पर नजर रखना भी होता है जरूरी

यह तथ्य सबको पता है कि व्यक्तित्व भविष्य के निर्माण उन्नति दोनों को ही प्रभावित करती है। लेकिन, व्यक्तित्व कामकाज पर किस हद तक प्रभाव डालती है कम लोग ही जानते हैं। कई लोगों को तो यह बात उस समय समझ में आती है जब वे काफी कुछ खो चुके होते हैं। कुछ प्रोफेशनल्स ऎसे भी हैं, जो अंत तक स्वीकार ही नहीं कर पाते कि उनके व्यक्तित्व में कुछ कमी है, जबकि इसका नुकसान वे आए दिन उठाते रहते हैं।
अच्छे व्यवहार या फिर आदर्श व्यक्तित्व की कोई सीमा नहीं है, बस जरूरत इस बात की है आप अपने व्यवहार को स्वयं निरीक्षण करें। किसी भी शीर्ष पद पर बैठे, मिड लेवल या फिर निचले स्तर पर काम करने वाले के व्यक्तित्व में सुधार की गुंजाइश होती है।
इसके लिए आवश्यक है कि आपको अपने व्यक्तित्व में जो भी कमी नजर आए या फिर आपके जिस व्यवहार के कारण आपको नुकसान उठाना पड़ा हो उसे दूर करने की कोशिश करें। व्यक्तित्व की कमजोरियां जानने के लिए आप मनोवैज्ञानिक परीक्षण की मदद ले सकते हैं। व्यक्तित्व विकास से जुड़े विशेषज्ञ भी आपकी मदद कर सकते हैं।
भाषा पर पकड़
पर्सनॉलिटी विकास के नाम पर कई लोगों का सोचना है कि अपने देश में यदि आपको धड़ल्ले से अंग्रेजी बोलना आती है तो आपके व्यक्तित्व का विकास हो गया है, जबकि वास्तविकता ऎसी नहीं है। भाषा के साथ और भी कई ऎसे कारक हैं जो व्यक्तित्व विकास के लिए महžवपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भाषा तो उनमें से एक पार्ट हो सकती है। आज के जमाने में अंग्रेजी सर्वग्राह्य भाषा हो गई है, इसलिए एक पूर्ण व्यक्तित्व के लिए इसका आना आवश्यक है।
प्रोफेशनल्स के लिए
मौजूदा समय में मल्टीनेशनल कंपनियों में इंटरव्यू के दौरान मनोस्थिति जानने के लिए उलटे सवाल किए जाते हैं, तनाव पैदा किए जाते हैं। नियोक्ता यह जानने का प्रयास करते हैं कि आप विपरीत परिस्थितियों में किस प्रकार से हैंडिल कर पाते हैं। तनाव के समय में आप सामने वाले से किस तरह का व्यवहार करते हैं।
कई बार ऎसा होता है कि अच्छे एकेडमिक कòरियर के बावजूद लोगों को इंटरव्यू में सफलता नहीं मिल पाती। इसका कारण काफी हद तक व्यक्तित्व पर निर्भर होता है। आजकल कंपनियां एकेडमिक नॉलेज के साथ ही व्यावहारिक ज्ञान पर ज्यादा घ्यान देती हैं। कंपनियां कर्मचारियों को अपने प्रतिनिधियों के रूप में देखना चाहती हैं, केवल कर्मचारी के रूप में ही नहीं।
सबसे बड़ी कमजोरी
आजकल युवाओं में जल्द ही सब कुछ हासिल करने की प्रवृत्ति विकसित होती जा रही है। आज के युवाओं के पास स्मार्टनेस है, नॉलेज है, लेकिन धैर्य नहीं। वे तत्काल कामयाबी की बुलंदी छूना चाहते हैं। यह आजकल के युवाओं की सबसे बड़ी कमजोरी है। लगातार जॉब बदलते रहना, किसी एक कंपनी में ज्यादा दिन तक नहीं रूकने की प्रवृत्ति इसका एक उदाहरण है।
हाई क्वालीफाइड प्रबंधन की पढ़ाई करने वाले लोगों को भी यह बताया जाता है कि धैर्य के अभाव में वे कुछ भी हासिल नहीं कर सकते। इसके बावजूद युवा उस पढ़ाई के पाठ को निजी जिंदगी में नहीं उतार पाते और जल्द ही सब कुछ हासिल करने के चक्कर में सब कुछ खो बैठते

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Saturday, July 11, 2009

सफलता के लिए इन्हें भी आजमांए..

कोई व्यक्ति ऊंचा काम कैसे पाता है। भाग्य, प्रतिभा या निष्ठा के कारण। जीवन के हर क्षेत्र में ऊंचा काम करने वालों के कुछ गुण और स्वभाव समान होते हैं। इसे कोई भी सीख सकता है। इसका मतलब यह नहीं है कि कोई भी कंपनी के अध्यक्ष पद तक पहुंच सकता है या ओलिंपिक पदक जीत सकता है। जीवन में सफलता पाने के लिए गारफील्ड ने सूत्र दिए हैं। वे इस प्रकार हैं-

सुनियोजित जीवन : हम प्राय: सुनते हैं कि जीवन में सफलता उन्हीं लोगों को मिलती है, जो काम के दीवाने होते हैं। ऎसे लोग जो दफ्तर में ज्यादा काम करते हैं, वे अपने आराम का ख्याल नहीं रखते। वे आराम से ज्यादा काम को तवज्जो देते हैं, ऎसे व्यक्ति अपने कार्य क्षेत्र के शिखर पर पहुंच तो जल्दी जाते हैं, लेकिन टिक नहीं पाते। इसके विपरीत सफल व्यक्ति जी-तोड मेहनत करने को तो तैयार रहते हैं, लेकिन सीमा में उनके लिए काम ही सब कुछ नहीं होता।
काम अपनी रूचि का चुनिए : अपनी रूचि के अनुसार काम चुनना चाहिए। जो पसंद हो वही काम करें। इससे काम में आनंद आता है। इससे सफलता के रास्ते खुलते हैं।
चुनौतीभरे काम की तैयारी : किसी भी कठिन काम को करने के लिए पहले से अभ्यास करना जरूरी है। आमतौर पर हम सिर्फ सपने देखते हैं। हवाई किले बनाते हैं। बैठे-बैठे किले बनाने से सफलता नहीं मिलती। इसलिए सकारात्मक काम करने की जरूरत है।
परिणाम पर ध्यान रखें : अनेक महत्वाकांक्षी तथा परिश्रमी व्यक्ति आदर्श काम करने की भावना से इतने ग्रस्त रहते हैं कि ज्यादा काम नहीं कर पाते। सर्वश्रेष्ठ कार्य वही लोग कर पाते हैं, जो पूर्णत: त्रुटिहीन काम करने के दबाव में नहीं रहते। वे अपनी गलतियों को असफलता नहीं मानते, उनसे अगली बार बेहतर काम करना सीखते हैं।
जोखिम उठाने तैयारी : व्यक्ति के जीवन में नीरसता आए या काम औसत दर्जे का हो तो वे जोखिम उठाने की जगह सुरक्षा को अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। ऊंचाई पर जाने वाले लोग जोखिम उठाने को तैयार रहते हैं। वे इसके लिए पहले से ही मानसिक रूप से तैयार होते हैं।
अपनी सामर्थ्य को कम ने आंकें : ज्यादातर लोग यह समझते हैं कि उन्हें अपनी सीमाएं मालूम हैं, लेकिन हमें जितना कुछ मालूम होता है वह जानकारी नहीं है। वह मिथ्या विश्वास है। यह हमें सीमाओं में बांधता है। ऊंचे लोग काम करने की कृत्रिम सीमाओं की परवाह नहीं करते। वे अपनी भावनाओं, अपनी कार्यप्रणाली और अपने प्रत्यनों की गतिशीलता पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
अपने-आप से करें स्पर्धा : काम करने वाले अपने प्रतिद्वंदियों को पीछे करने के बजाय पिछले प्रयत्नों से आगे निकलने की कोशिश करते हैं। ऊंचे काम करने वालों की रूचि किसी भी काम को अपनी कसौटी के अनुसार बेहतर ढंग से करने की होती है, इसलिए वे अलग रहने के बजाय मिल-जुलकर काम करते हैं। अपनी प्रतिभा का ज्यादा से ज्यादा सदुपयोग करते हैं।

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Thursday, May 21, 2009

तरक्की का राजमार्ग है समय प्रबंधन

कुछ लोग ऑफिस में समय से पहले आते हैं। ऑफिस में अपना काम पूरा करने के लिए देर तक रूकते हैं। हर समय हड़बड़ाहट उनके काम में देखने को मिलती है। यही नहीं अपनी खुद की लाइफ जीने के लिए भी उनके पास समय नहीं होता। यदि यह आपके साथ भी है, तो एक बार सोचने की जरूरत है। इसकी वजह काम की अधिकता न होकर, काम की सही प्लानिंग न करना भी हो सकता है। किसी भी काम को अगर प्लानिंग के साथ किया जाए, तो वह बेहतर परिणाम देता है। टाइम प्लानिंग एक बहुत ही जरूरी कदम है, जो काम को बेहतर बनाने में खासा सहायक है।

इन्हीं व्यस्तताओं के बीच कुछ समय बचा लेना, जिसे दूसरे उपयोगी कामों में लगाया जा सके , जरूरी है। ऎसा करके आप समय का अपव्यय रोक सकेंगे। दूसरे शब्दों में समय का वह टुकड़ा, जो अनजाने में व्यर्थ चला जाता है उसे बचाकर हम अधिक उत्पादक बन सकते हैं। इस तरह वह बचाया गया समय उत्पादन की दृष्टि से नया है, जिसे हमने ही क्रिएट किया है। ऎसा करने से समय के प्रति सोच सकारात्मक हो जाती है।
समय की कीमत
समय की कीमत को जानना जरूरी है। जिस तरह से आज हर किसीके जीवन में आर्थिक सुरक्षा उसकी मूल आवश्यकता है, तभी उसके कदम प्रगति की ओर बढ़ पाते हैं। धन-उपार्जन के लिए समय का सदुपयोग करना बहुत जरूरी है। समय का दुरूपयोग करने का मतलब होगा धन कमाने की संभावना को गंवा देना।
कई बार हम छोटी-छोटी चीजों को खरीदने के लिए बाजार के कई चक्कर लगाते हैं। ऎसे में एक तो पेट्रोल खर्च होता है, दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण कि आपका समय उसमें बरबाद होता है। अपने अमूल्य समय का नुकसार न करें। अपने हर सेकंड को समय की प्लानिंग में शामिल करें। क्योंकि , छोटी-छोटी बचत ही बाद में मोटी बचत के रूप में सामने आती है।
इसमें उन सभी कामों को शामिल करें, जो प्राथमिक हों या फिर बहुत ही महत्वपूर्ण। यह सूची एक दिन पहले तैयार की जानी चाहिए। यानी हम आज उन कामों की योजना बनाएं जो हमें कल करने हैं।
-अपने हर काम का समय तय कर सकते हैं। घंटों के हिसाब से काम का शेड्यूल बनाने की आदत को टाइमटेबल में शामिल कर लें। ध्यान रहे, अपने टाइमटेबल में उतना ही काम लें, जितना आप कर सकते हैं। रोजाना अपनी लिस्ट को रिवाइज करें। ताकि , सभी काम समय पर पूरे हो जाएं।

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Tuesday, May 5, 2009

वादियों संवारने मे बनाएं अपना भविष्य...

यदि आप प्रकृति प्रेमी हैं और प्रकृति को संवारने की इच्छा रखते हैं तो आप फील्ड लैंडस्केप आर्किटेक्ट बनकर धन, प्रसिद्धि और सम्मान प्राप्त कर सकते हैं। यह क्षेत्र आपको अपनी कल्पना शक्ति को साकार करने का भरपूर अवसर देता है। इस क्षेत्र में आपको नेचर के साथ काम करने का खूब मौका मिलता है।

आप अलग-अलग रूपों में अपनी कल्पना शक्तिऔर इंटेलीजेंसी को अपनाकर बेहतर परिणाम दे सकते हैं। यह ग्रीन सिटीज,एनर्जी एफीशिएंट कम्युनिटीज और वाटर कंजरवेशन स्ट्रेटजीज का सम्मिलित क्षेत्र है। यहां अपने विचारों को अपने अनुसार प्रस्तुत कर सकते हैं। इसके जरिए आप इंडस्ट्रीज से जुड़े विकास कार्यो ,पुरानी बंद हो चुकी खानों की जमीनों के दुबारा इस्तेमाल,हैरिटेज लैंडस्केप जैसे बड़े क्षेत्रों के लिए काम कर सकते हैं।
रहने की जगहों को रमणीक और सुन्दर बनाने और सिमटते हुए भू-भागों को हरा-भरा बनाने के लिए विशेष तैयारी करने की जरूरत होती है। पर्यावरण से जुडे व्यावहारिक पक्षों और उपयोगी मुद्दों को ध्यान में रखकर ऎसा वातावरण बनाना होता है कि देखने वाले को सुकून मिले। इसके लिए ध्यान रखना होता है कि आप छोटे उद्यान, फार्म हाउस, माल्स, रिसोर्ट,टैरेस गार्डन, टाउनशिप और हाउसिंग जैसी बड़ी परियोजनाओं की डिजाइनिंग के साथ साथ किसी रीजन के लिए एन्वायरमेंटल इंपैक्ट असेसमेंट की स्टडी करना भी शामिल है।
इस तरह के अध्ययन में अर्बन ग्रोथ का आकलन, खुली जगहों की जरूरत,शहरों में हरियाली बनाने के विशेष प्रयास करना आदि शामिल हैं। सेंटर फॉर एन्वायरमेंटल प्लानिंग एंड टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी, अहमदाबाद स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर (एमसीपीए), नई दिल्ली, स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर0 एंड प्लानिंग, अन्ना यूनिवर्सिटी, चेन्नई इन संस्थानों में अध्ययन करने के बाद प्रारंभिक वेतन 25,000 रूपए प्रतिमाह हो जाता है। पांच साल बाद यही सेलरी 1 लाखरूपए तक हो सकती है।

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Friday, January 16, 2009

"नेट पर हिंदी के विस्तार की अपार संभावनाएं"

नई दिल्ली। समकालीन हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर और जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के प्रोफेसर असगर वजाहत का कहना है कि इंटरनेट पर हिंदी के विस्तार की व्यापक संभावनाएं हैं। इंटरनेट के जरिए हिंदी को विश्व के विभिन्न हिस्सों से जोड़ा जाना चाहिए। इसके लिए इंटरनेट पर हिंदी साहित्य को लोकप्रिय बनाने की आवश्यकता है।

असगर वजाहत ने यह बात राजधानी स्थित गांधी शांति प्रतिष्ठान के सभागार में "हिंद-युग्म" संस्था द्वारा इंटरनेट पर हिंदी भाषा, साहित्य, कला और तकनीक मसले पर आयोजित एक कार्यक्रम में कही।कार्यक्रम में कहानीकार और अंतर्राष्ट्रीय हिंदी संस्था कथा के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा और युवा कथाकार गौरव सोलंकी ने कथा पाठ किया। सोलंकी ने दो छोटी कहानियां "डर के आगे" और "तुम्हारी बांहों में मछलियां क्यो नहीं है" पढ़ीं, वहीं शर्मा ने "पासपोर्ट" नामक कहानी का पाठ किया।
कार्यक्रम में इंटरनेट पर हिंदी के प्रसार में ब्लॉगिंग के हस्तक्षेप पर भी चर्चा हुई। "हिंद-युग्म" के संस्थापक शैलेश भारतवासी ने बड़ी संख्या में ब्लॉग जगत से जुड़ने की वकालत की। कार्यक्रम के अंत में असगर वजाहत ने भी अपनी कुछ कहानियों को सुनाया।

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Wednesday, January 14, 2009

पर्यटन मे है अपार संभावनाएं..

विश्वव्यापी मंदी के बावजूद पर्यटन क्षेत्र में विकास की दर 14 प्रतिशत सालाना से अधिक दर्ज की गई है। पर्यटन मंत्री अंबिका सोनी के हाल के एक वक्तव्य के अनुसार, प्रति वर्ष इस क्षेत्र में दो लाख से अधिक ट्रेंड कर्मियों के लिए रोजगार सृजित होते हैं, पर इस मांग की तुलना में आपूर्ति कहीं कम है।

यही कारण है कि भारी संख्या में लोगों को ट्रेंड करने के लिए प्रत्येक राज्य में कम से कम एक होटल मैनेजमेंट एवं फूड क्राफ्ट इंस्टीट्यूट खोलने की भावी योजना केंद्रीय सरकार के स्तर पर बनाई जा रही है। इतना ही नहीं, तीन सप्ताह की ट्रेनिंग देकर स्कूल कॉलेज के युवाओं को भी इस क्षेत्र से जोडने की योजना है।
देश में ऐतिहासिक इमारतों, किलों, धरोहरों, प्राकृतिक सौंदर्य से पूर्ण स्थलों, खूबसूरत समुद्री तटों, रमणीक हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाओं की कमी नहीं है। इनके प्रति टूरिस्ट में आकर्षण पैदा करना तथा विलेज टूरिज्म, इकोटूरिज्म, एडवेंचर टूरिज्म, क्रूज टूरिज्म, मेडिकल टूरिज्म के साथ इन्हें जोडने की दिशा में तमाम नीतियां बनाई जा रही हैं।
ऐसे में नि:संदेह पर्यटन क्षेत्र में रोजगार के असीम अवसर भविष्य में उभरकर सामने आएंगे, जिनका लाभ युवा उठा सके हैं। इस क्रम में यह बताना भी जरूरी है कि विदेशी और क्षेत्रीय भाषाओं के जानकारों के लिए इस क्षेत्र में रोजगार पाना कहीं अधिक आसान होगा।

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Tuesday, January 6, 2009

हौसला अफजाईं से भरिए लोगों में कामयाबी का जज्बा...

किसी ने ठीक ही कहा है कि "यदि लोग खुद पर भरोसा करना सीख जाएं, तो वे स्वयं के बारे में सोची गई काबलियत से कहीं अधिक उपलब्धियां हांसिल कर सकते हैं।" परन्तु अफसोस इस बात का है इस दुनिया में ज्यादातर लोग खुद कम काबिल एवं अपनी कमियों को बढा कर देखने के आदी हो गए हैं , जिसके कारण वे अपनी जिन्दगी की मंजिल तक नहीं पहुंच पाते हैं।

ऎसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि इस संसार में उन व्यक्तियों की सख्त जरूरत हैं, जो अपने शब्दों और क्रियाओं से दूसरों में जोश भर सकें और उन्हें कुछ बडा करने की भावनाओं से ओत-प्रोत कर सकें। पुराने समय में भी सेना के साथ चारण भाट आदि चला करते थे, जो अपनी जोशीली रचनाओं से सैनिकों में जोश भरा करते थे।
आज के समय में भी बैण्ड किसी भी देश की आर्मी का एक अभिन्न अंग है। उत्साह बढाने को आजकल चीयर लीडिंग की भी संज्ञा दी जाती है और इसका खेलों में जबरदस्त इस्तेमाल हो रहा है।
खेलों में कुछ लोग अपनी विशेष क्रियाओं से दर्शकों और अपनी टीम को अच्छी परफॉर्मेस के लिए उत्साहित करते हैं। कहते हैं कि इसका पहला प्रयोग अमरीका में 1880 के अन्त में एक स्कूल के एथलेटिक प्रतियोगिता में किया गया था। इस प्रतियोगिता में दर्शकों की ओर से बारी-बारी बोले गए विशेष नारों ने टीम का बेहद उत्साहवर्धन किया और टीम ने अच्छे परिणाम भी दिखाए।
सन् 1898 में अमरीका की मिनेसोटा यूनिवर्सिटी के एक स्टूडेंट ने अपने कुछ सहायकों के साथ फुटबाल मैंच में जबरदस्त चीयर लीडिंग करी और दर्शकों के साथ खिलाडियों का दिल जीत लिया। फिर क्या था अब तो तकरीबन प्रत्येक टुर्नामेंट में चीयर लीडिंग करने की होड सी लग गई। प्रारम्भ में चीयर लीडिंग के लिए छ: पुरूषों की टीम होती थी, परन्तु 1923 के बाद से इसमें लडकियों ने भी भाग लेना प्रारम्भ कर दिया। आज इसमें अधिकतर लडकियां ही भाग लेती हैं।
धीरे-धीरे इस चीयर लीडिंग एक्टिविटी में डांस, जिम्नास्टिक, टम्बलिंग आदि का भी जमकर समावेश हुआ। चीयर लीडर्स की यूनीफॉर्म और अधिक आकर्षक होती चली गई। आकर्षक होने की होड में कुछ ग्लैमर के इनपुट आने से यह कई जगह एक मोरल इश्यू भी बन गया। परन्तु अभी भी यह संसार के कई प्रतिष्ठित टुर्नामेंट का एक अभिन्न अंग है जिसमें अब ट्वन्टी-ट्वन्टी क्रिकेट मैच भी शामिल हो गए हैं।
अमरीका में तो नेशनल चीयर लीडर्स एसोशियन के नाम से एक संस्था भी है। संसार की "वल्र्ड चीयर लीडिंग एसोशियन" प्रतिष्ठित टी.वी. चैनलों के सहयोग से चीयर लीडिंग के टुर्नामेंट भी कराती है, जिसमें लाखों लोग पार्टिसिपेट करते हैं। आज संसार में "चीयर लीडिंग" एक इण्डस्ट्री बन चुका है। जिसमें जिम्नास्टिक, डांस, कोरियोग्राफी, फिटनेस आदि सीखाई जाती हैं। कई दुकान वाले चीयर लीडिंग से संबंधित जूते, ड्रेसेज, बुक्स आदि बेचकर धन बटोर रहे हैं। भारत में इसका क्या असर रहेगा, यह तो समय ही बताएगा, परन्तु इसका स्कोप जबरदस्त है।

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Saturday, January 3, 2009

नौकरी जुनून बन जाए तो कहने क्या....

करियर में आगे बढ़ने के लिए अपना पैशन ढूंढना बेहद जरूरी है। आप जो कर रहे हैं, अगर वह करना आपको अच्छा लगता है, तो आपको हर दिन वही करना चाहिए। बचपन से हमारे अंदर किसी एक चीज के लिए पैशन जग जाता है। वह कुछ भी हो सकता है जैसे लिखना, गाना, बोलना आदि। जुनून आपके रहने के तरीके को बदल देता है। लेकिन ज्यादातर लोग अपना पैशन ढूंढ नहीं पाते हैं।

जुनून किसी भी चीज के लिए हो सकता है। अगर आप हमेशा खुश रहते हैं, तो आप कभी मायूस नहीं होंगे। हमेशा खुश रहने के लिए भी जुनून चाहिए। क्या आपने कभी अपनी बुरी आदतों को छोड़ने की कोशिश की है। क्या आप इसमें सक्सेसफुल रहे। आप तब तक सफल नहीं होंगे, जब तक आप मुश्किल की जड़ के बजाय मुश्किल पर ध्यान देंगे। हर समस्या की जड़ है, एक ऎसी जिंदगी, जिसमें जुनून नहीं है। यानी कोई मूल्य नहीं है। बिना मूल्यों की जिन्दगी में नकारात्मक आदतें उभरती हैं, इसलिए जुनून से बुरी आदतें भी खत्म होंगी।
अपना पैशन कैसे ढूंढें
कई बार ऎसा होता है कि आपका पैशन पहले से ही आपकी लाइफ में होता है, लेकिन आप उसे ढूंढ नहीं पाते। यह देखें कि ऎसी कौन सी चीज है, जो बहुत समय से आपके साथ है या जो बहुत समय से आप चाहते हैं या करना चाहते हैं। शायद यही आपके जीवन का पैशन हो। इसी को पाने की राह पर चल पड़ें, तब ही आपका जीवन पूर्ण होगा। जुनून आपसी रिश्तों को भी सुधारता है, क्योंकि ऎसे व्यवहार से आप अपने परिवार और आसपास की चीजों को बहुत पसंद करने लगते हैं। आपका परिवार आपको खुश देखकर वैसे भी बहुत खुश होगी।
लाइफ में पैशन होने का एक और फायदा है, वह यह कि इससे दूसरे लोग भी प्रेरित होते हैं। अपने पैशन की वजह से आप बहुत से लोगों के प्रेरणा स्रोत बन सकते हैं। लेकिन कई बार ऎसा होता है कि पैशन ढूंढ लेने के बाद भी लोग संघर्ष करते हैं। अगर आप सजग नहीं रहेंगे, तो आपका पैशन आपसे दूर भी हो सकता है।
जब आप अपना जुनून ढूंढ लें, तो कभी इसे अपने से दूर न होने दें। हमेशा सकारात्मक लोगों के साथ ही रहें, ताकि जिन्दगी के प्रति आपका पैशन खत्म न हो। साथ ही ऎसी किताबें पढ़ें, जो आपको प्रेरित करें। कार्यक्रम सुने । अगर आप किसी दुविधा में हैं, तो सब चीजें समय पर छोड़ दें। सही समय आने पर सब खुद-ब-खुद ठीक हो जाता है। बस आप अपनी सोच को सकारात्मक बनाए रखें।

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Sunday, December 28, 2008

काश हम कर पाते मीठा मीठा गप्प कड़वा कड़वा थू...

कहते हैं कि आदमी की सोच ही उसकी जीवन की दिशा तय कर देती है। ऐसे मे कितना अच्छा होता अगर हर इंसान अपने साथ हुई केवल मीठी और सुखद बातों को ही याद रख पाता, दुख-दर्द पहुंचाने वाली तमाम बुरी बातों को भूल जाता।

हालांकि जज्बातों के स्तर पर हर चोट और कड़वे अनुभव को भुला पाना आसान नहीं हैं लेकिन साइंस अपनी पूरी कोशिश में लगी है अगर कामयाब रही, तो एक दिन ऐसा मुमकिन हो सकता है। तब शायद सिनेमा के पर्दे पर मोहब्बत के मारे किसी हीरो को अपना गम गलत करने के लिए बोतल का सहारा नहीं लेना पड़ेगा। लेकिन साइंस यह करेगी कैसे? जानी-मानी साइंस मैगजीन साइंस डेली में इस बारे में छपी एक रिपोर्ट पर नजर डालें, तो गुत्थी कुछ सुलझती नजर आती है।
दरअसल, इंसानी दिमाग सूचनाओं को इकट्ठा करने और उन सूचनाओं की प्रोसेसिंग करने में कंप्यूटर की तरह फंक्शन करता है। कंप्यूटर में इन दोनों भूमिकाओं के लिए अलग-अलग डिवाइस होते हैं। जहां कंप्यूटर का हार्ड डिस्क सूचनाएं इकट्ठा करता है, वहीं इसका सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट (सीपीयू) इन्फर्मेशन प्रोसेसिंग का काम करता है। लेकिन जहां तक हमारे मस्तिष्क का सवाल है, माना जाता है कि उसके अंदर मौजूद एक ही सेल के अंदर ये दोनों काम होते हैं। इस सेल को हम 'न्यूरॉन्स' के नाम से जानते हैं। रिसर्चर इस बात का पता लगाने की कोशिश में जुटे हैं कि क्या बेन सेल्स के अंदर पाए जाने वाले अलग-अलग किस्म के मॉलिक्यूल (अणु) अलग-अलग तरह की भूमिकाएं निभाते हैं?
अमेरिका के न्यू यॉर्क स्थित सनी डाउनस्टेट मेडिकल सेंटर के रिसर्चरों ने ऐसी रिसर्च की है, जिससे आने वाले वक्त में दिमाग से दुख भरी यादों और किसी चीज की लत को खत्म करने की क्षमता पैदा हो सकती है। रिसर्चरों ने पाया है कि मेमरी को सुरक्षित रखने वाला मॉलिक्यूल पीके जीटा विशेष रूप से जटिल और हाई कैटिगरी की मेमरी को स्टोर करता है जो किसी प्राणी की स्थिति, डर और कामों के बारे में विस्तृत सूचनाएं मुहैया कराता है। लेकिन पीके जीटा मॉलिक्यूल का इन सूचनाओं की प्रोसेसिंग करने या इसे व्यक्त करने की क्षमता पर नियंत्रण नहीं होता। यह खोज संकेत देती है कि पीके जीटा मॉलिक्यूल ब्रेन की कंप्यूटिंग क्षमता को बरकरार रखते हुए दिमाग से कड़वी यादों को मिटाने में मददगार साबित हो सकता है।
इस स्टडी के नतीजे विस्तार से पब्लिक लाइब्रेरी ऑफ साइंस बायॉलजी के दिसंबर अंक में छपे हैं। इस पेपर को तैयार करने वाले साइंटिस्टों में एक डॉक्टर फेंटन के अनुसार, अगर आगे इस दिशा में रिसर्च कामयाब रही तो हम भविष्य में पीके जीटा मेमरी इरेजर के आधार पर दिमाग से बुरी यादों को मिटाने वाली कई थेरपी ढूंढ पाएंगे। लोगों के मन से नकारात्मक यादों को खत्म कर देने से उन्हें न केवल दुखद यादों से छुटकारा मिल पाएगा बल्कि यह डिप्रेशन, सामान्य रूप से पैदा होने वाली चिंता, फोबिया, सदमे के बाद पैदा होने वाली स्ट्रेस और ऐडिक्शन का इलाज करने में भी मददगार साबित होगा।

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Saturday, December 27, 2008

क्लीनिकल शोध क्षेत्र मे हैं कैरियर के सुनहरे अवसर..

भारत में क्लिनिकल रिसर्च का बाजार लगभग 50 फीसदी की दर से बढ रहा है। अंतरराष्ट्रीय क्लिनिकल रिसर्च बाजार करीब 178 अरब डॉलर का है। भारत में वर्ष 2010 तक 50 हजार प्रोफेशनल्स की दरकार। डिप्लोमा, पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा आदि कोर्स उपलब्ध। भारत में शुरुआती वेतन प्रति माह 15 से 25 हजार रुपये।

जब कोई नई दवा बाजार मे उतारने की तैयारी होती है, तो दवा लोगों के लिए कितनी सुरक्षित और असरदार है, इसके लिए प्रयोगशाला परीक्षण होता है। भारत की जनसंख्या और हां उपलब्ध सस्ते प्रोफेशनल की वजह से क्लिनिकल का कारोबार तेजी से फलने-फूलने लगा है। यदि आप भी इस बढते हुए बाजार का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो क्लिनिकल ट्रॉयल या क्लिनिकल रिसर्च से जुडे कोर्स कर सकते हैं।
क्लिनिकल इंडस्ट्री
भारत में क्लिनिकल ट्रॉयल इंडस्ट्री करीब 30 करोड डॉलर का है और वर्ष 2010 तक बढ कर यह इंडस्ट्री दो अरब डॉलर तक पहुंच जाने की उम्मीद है। गौरतलब है कि दुनिया की प्रमुख दवा कंपनियां अब क्लिनिकल रिसर्च संबंधी जरूरतों के लिए भारतीय बाजार की ओर रुख कर रही हैं।
योग्यता और कोर्स
क्लिनिकल रिसर्च के कोर्स में एंट्री के लिए विज्ञान में स्नातक होना जरूरी है। इसके अलावा, डी.फार्मा, बी.फार्मा, एम.फार्मा आदि के स्टूडेंट्स भी इस कोर्स में प्रवेश ले सकते हैं। कई प्रतिष्ठित संस्थानों से क्लिनिकल रिसर्च में डिप्लोमा, पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा आदि की जा सकती है।
कहां- कहां हैं संभावनाएं
एक अनुमान के मुताबिक, दुनिया भर में क्लिनिकल रिसर्च के क्षेत्र में करीब ढाई लाख से ज्यादा पद खाली हैं। वहीं योजना आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश में क्लिनिकल रिसर्च के क्षेत्र में करीब 30 से 50 हजार प्रोफेशनल्स की कमी है। इंस्टीट्यूट ऑफ क्लिनिकल रिसर्च एजुकेशन ऐंड ट्रेनिंग, मुम्बई के असिस्टेंट डायरेक्टर अजीत मराठे कहते हैं, क्लिनिकल प्रोफेशनल्स की मांग और सप्लाई में भारी अंतर के कारण ही हमने अपना ट्रेनिंग इंस्टीटयूट शुरू किया है।
इसकी प्रमुख वजह यह है कि यहां प्रशिक्षित कर्मियों और प्रशिक्षण संस्थानों की बेहद कमी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस उद्योग में बहुत अच्छा वेतन मिलता है, जो सालाना 40 हजार डॉलर से लेकर एक लाख डॉलर तक होता है। भारत में शुरुआती सालाना सैलॅरी 1।8 लाख से लेकर पांच लाख रुपये तक होती है। क्यूरी मानवता कैंसर सेंटर, नासिक के चीफ सर्जिकल ओनकोलॉजिस्ट डॉ. राज वी. नागरकर कहते हैं, भारतीय डॉक्टर अपनी प्रैक्टिस छोडकर क्लिनिकल ट्रॉयल के क्षेत्र में उतरना नहीं चाहते, क्योंकि यहां डॉक्टरी का पेशा ज्यादा सम्मानजनक माना जाता है।
बहुत से डॉक्टरों को क्लिनिकल ट्रायल और इसमें उपलब्ध अवसरों के बारे में पता ही नहीं है। मंदी के चलते फार्मास्युटिकल कंपनियां नए प्रोजेक्ट्स हाथ में भले ही न लें, लेकिन जो-जो प्रोजेक्ट चल रहे हैं, उनको पूरा करने के लिए अभी भी बडी संख्या में कुशल प्रोफेशनल्स की जरूरत है। मराठे कहते हैं, तेज गति से बढोत्तरी के बावजूद भारत में अच्छे क्लिनिकल प्रैक्टिस वाले प्रशिक्षित इंवेस्टिगेटर्स, बायो-एनालिटिकल साइंटिस्ट और फार्माकोकाइनेटिक्स की काफी कमी है।
प्रशिक्षण संस्थान
इंस्टीटयूट ऑफ क्लिनिकल रिसर्च एजुकेशन ऐंड ट्रेनिंग, मुम्बई, पूना और नासिक (पीजी डिप्लोमा इन क्लिनिकल रिसर्च, फार्माकोविजिलेंस और एमएसएसी इन क्लिनिकल रिसर्च) www.icreat.इन इंस्टीट्यूट ऑफ क्लिनिकल रिसर्च, मुम्बई, दिल्ली और बेंगलुरु (पीजी डिप्लोमा इन एडवांस क्लिनिकल रिसर्च) www.icriindia.कॉम क्लिनिकल रिसर्च एजुकेशन ऐंड मैनेजमेंट एकेडमी, मुम्बई, बेंगलुरु और दिल्ली (एडवांस पीजी डिप्लोमा इन क्लिनिकल रिसर्च आदि) www.cremaindia.org

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Wednesday, December 24, 2008

दमदार बायोडाटा यानि नौकरी का पासपोर्ट...

आजकल नौकरियों की हालत एक अनार सौ बीमार वाली हो गई है। एक ही नौकरी के लिए सैकड़ों उम्मीदवारों की लाइन लगी होती है। ऎसे में सभी को तो इंटरव्यू के लिए बुलाया नहीं जा सकता, लिहाजा कॉल के लिए चयन रिज्यूमे के आधार पर होता है। ऎसे में रिज्यूमे तैयार करते समय कुछ खास बातों का ध्यान रखना जरूरी है।
* पद की जरूरतों के मुताबिक हो — रिज्यूमे को देखने के दौरान आपकी एक छवि बना ली जाती है। ऎसे में अगर देखने वाले को जॉब प्रोफाइल से मैच करती चीजें नहीं मिलेंगी, तो वह आपको नौकरी के लिए सही कैसे मानेगा। इसलिए बायोडेटा का डिजाइन ऎसा रखें, जिसमें आपकी काबिलियतें व अनुभव उभरकर आएं। ध्यान रखिए कि इस डिजाइन के जरिये आपको पहली ही नजर में पढ़ने वाले को प्रभावित करना है।
* सही सामग्री चुनें — रिज्युमे का अच्छा डिजाइन सही जानकारी के बिना कुछ नहीं कर पाएगा, इसलिए इसमें दी जाने वाली जानकारियों का खास ध्यान रखें। इंटरव्यू के लिए आने वाले बुलावों की संख्या इस बात पर काफी निर्भर करती है कि आप अपने बारे में जानकारी किस तरह देते हैं।
* पावर वर्ड चुनें — अंकों और संख्यात्मक वाले जानकारी का प्रयोग एक अच्छी छवि बनाता है, जबकि आम व्क्तव्य जल्दी ही भुला दी जाती हैं। साथ ही, नौकरी के लिए आवेदन करते समय शब्दों का चयन बेहद सोच-समझकर करें। आपकी कोशिश पद के जरूरत से मेल करते शब्दों को चुनने की होनी चाहिए।
* कूट शब्द —नौकरी के लिए विज्ञापन देते समय कई तरह के कूट-शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं। इन शब्दों को पहचानें और इन्हें रिज्यूमे में डालें। इससे आपका प्रभाव बहुत अच्छा बनेगा।
*शीर्षक व इबारतें — किसी भी जॉब के लिए हजारों की संख्या में आवेदन आते हैं। ऎसे में आपका बायोडाटा इतना इंप्रेसिव होना चाहिए कि वह पांच सेकंड में ही दूसरों को प्रभावित कर दे। इसके लिए आप अपनी स्किल्स व योग्यताओं को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर हेडिंग्स के जरिये पेश करें। हालांकि ये शीर्षक नौकरी की जरूरत से मेल खानीचाहिए।
* नियोक्ता की जरूरत पहचानें — आज के प्रतियोगी युग में आपको जॉब तभी मिल सकती है, जब आप खुद को अच्छे से प्रेजेंट करने के साथ जॉब ऑफर करने वाले की जरूरत को भी समझेंगे। ऎसे में आप अपने रिज्यूमे में यह लिख सकते हैं कि इस जॉब में आने वाली परेशानियों को आप किस तरह सुलझाने में सक्षम हैं।
* नौकरी के मुताबिक बायोडाटा — हर जगह एक ही रिज्यूमे भेज देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि इसमें जॉब की जरूरत के मुताबिक बदलाव लाना चाहिए। यह बात आपके कवर लेटर पर भी लागू होती है। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि गलत वर्तनी और कमजोर संरचना के वाक्यों से उम्मीदवार के बारे में नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसलिए रिज्यूमे को त्रुटि रहित बनाने का प्रयास करें। यह सुनिश्चित कर लें कि आपका रिज्यूमे साफ-सुथरा व देखने में सुंदर लगे। इसके लिए आपको उच्च गुणवत्ता के सफेद कागज को प्रयोग में लेना चाहिए। रिज्यूमे का फाइनल प्रिंट लेने से पहले एक प्रिंट लेकर उसे अच्छी तरह से देख लें, यह सुनिश्चित कर लें कि उसमें कोई त्रुटि अब नहीं बची है।
* स्किल्स दिखाएं — अपने स्किल्स को पहचानें व इंटरव्यू के दौरान उसे बताएं भी । इसके साथ ही रिज्यूमे में इस बात को अच्छी तरह से दिखांए । ध्यान रखें कि इंटरव्यू के दौरान इस पक्ष पर आपसे सबसे ज्यादा सवाल पूछे जा सकते हैं, लिहाजा इसे उसी तरह पेश करें।
* वेतन के मुताबिक छवि बनाएं — नौकरी के स्तर व वेतन वृद्धि को ध्यान में रखते हुए ही रिज्यूमे तैयार करें। साथ ही, अपनी ऎसी छवि भी तैयार करें, जिससे लगे कि आप वाकई इस स्तर तक पहुंचने के काबिल हैं।
* जानकारी सही तरह रखें — रिज्यूमे तैयार करते समय अकसर लोग महत्वपूर्ण जानकारी को नीचे कर देते हैं और कम जरूरी जानकारियां पहले डाल देते हैं। इसलिए जब भी अपना रिज्यूमे तैयार करें, तो उस दौरान सारी जानकारी को प्राथमिकताओं के हिसाब से व्यवस्थित करें। ध्यान रखें कि एक अच्छी व दमदार बिन्दु बाद में आने वाली अच्छी जानकारी को ज्यादा प्रभावी बना देती है।
* अपना रिज्यूमे विशिष्ट बनाएं — अपनी क्षमताओं व कुशलताओं को आप ऎसे वर्गीकृत कर प्रस्तुत करें जिसमें आप सहजता का अनुभव करें। यह आपको संबंधित व पेशेवर अनुभवों से दूसरे कार्यानुभव को एक अतिरिक्त वर्ग बनाकर अलग करने में सहयोग करेगा। इस प्रकार आप संबंधित कुशलताओं को अपने रिज्यूमे के शीर्ष पर वर्ग में रख सकते हैं ताकि वे पहले पढ़े जा सकें। संबंधित अनुभव के स्थान पर आप अपने क्षेत्र के अनुभव को वर्ग शीर्षक में लिख सकते हैं, जैसे व्यापारिक अनुभव, इंजीनियरिंग अनुभव, मानव सेवा अनुभव, विक्रय अनुभव आदि।
यह सब लिखते हुए इस बात का ध्यान रखें कि रिज्यूमे में कोई ऎसी बात नहीं लिखें, जिससे कि आप को इन्टरव्यू के दौरान किसी भी प्रकार की असुविधा का सामना करना पड़े। इसमें वही बातें और अनुभव लिखें जिसे आप पूरा करते हों, ऎसी बातें या ऎसे तथ्य नहीं डाले जाने चाहिए जो झूठे हों।
ध्यान रहे कि इन्टरव्यू लेने वाला आपके रिज्यूमे के आधार पर ही आपके व्यक्तित्व का आकलन करता है और उसी के आधार पर आपसे पूछे जाने वाले सवालों का स्तर भी तय किया जाता है। ऎसे में आधारहीन बातों का रिज्यूमे में उल्लेख आपको ही परेशानी में डाल सकता है। प्रयास करें कि ऎसे किसी भी तथ्य या अनुभव का उल्लेख न हो जो पूरा नहीं करते हों या फिर उसमें आपकी पकड़ कमजोर हो। इसके बजाय यह ज्यादा अच्छा है कि कमजोर पक्षों का उल्लेख रिज्यूमे में हो ही न।

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Sunday, December 21, 2008

नई दिशांए-चिप लेवल इंजीनियरिंग

सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में चिप लेवल इंजीनियरों की मांग एकदम से बढ़ी है। लेकिन यह भी सच है कि आईटी शिक्षा प्राप्त करने वाले अधिकतर प्रशिक्षुओं को चिप लेवल के बारे में कोई जानकारी ही नहीं है। चिप लेवल इंजीनियरिंग कोर्स करने के तुरंत बाद कम्प्यूटर निर्माण, एसेम्बलिंग करने वाली राष्ट्रीय/बहुराष्ट्रीय कंपनियों में अच्छे ऑफर मिलने लगते हैं। आजकल कंप्यूटर निर्माण करने वाली कंपनियां चिप लेवल इंजीनियरों को ही ऊंचे वेतनमान पर तुरंत रोजगार दे रही हैं। आज संपूर्ण आईटी उद्योग सच माइने में चिप लेवल इंजीनियर की कार्य-कुशलता पर ही टिका हुआ है।
चिप लेवल क्या है

कंप्यूटर ट्रेनिंग दो प्रकार की होती हैं। पहली सॉफ्टवेयर ट्रेनिंग और दूसरी हार्डवेयर ट्रेनिंग। सॉफ्टवेयर के अंतर्गत विभिन्न तरह के कंप्यूटर प्रोग्राम और सॉफ्टवेयर बनाने की ट्रेनिंग दी जाती है। सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग को कंप्यूटर के सामने बैठे-बैठे सारा काम करना होता है। इसमें महारथ हासिल करने के लिए अंग्रेजी भाषा पर अच्छी पकड़ होनी अनिवार्य है क्योंकि पूरा पाठ्यक्रम अंग्रेजी में ही संचालित होता है। इसका नतीजा यह होता है कि अंग्रेजी पर कमजोर पकड़ वाले छात्र उतने सफल नहीं हो पाते। इसलिए ऎसे छात्रों को हार्डवयेर ट्रेनिंग लेनी चाहिए। हार्डवयेर टे्रनिंग अनेक संस्थाओं में हिंदी में भी दी जाती है। यह दो प्रकार की होती हैं।
कार्ड लेवल कोर्स एवं चिप कम्पोनेंट लेवल कोर्स
कार्ड लेवल ट्रेनिंग ही अधिकतर संस्थानों में आजकल दी जा रही है। चिप लेवल के कुछ गिने-चुने संस्थान ही हैं। कार्ड लेवल के अंतर्गत असेम्बलिंग, मेंटनेंस आदि सिखाया जाता है। इस कोर्स में केवल यह सिखाया जाता है कि यदि कंप्यूटर में कोई त्रुटि हो जाए तो खराब हुआ पार्ट बदल कर दूसरा पार्ट/कार्ड या पुर्जा लगा दिया जाए।
लेकिन इससे बिल्कुल अलग है चिप लेवल पाठ्यक्रम इस कोर्स को करने वाला व्यक्ति खराब कार्ड, पार्ट या पुर्जे को सिर्फ बदलने का ही काम नहीं करता बल्कि यह खराब कार्ड या पार्ट को दुरूस्त करके उसे पूर्ववत काम करने लायक बना देता है। जाहिर है कार्ड बदलने पर खर्च अधिक आता है जबकि ठीक कर देने में नाम मात्र खर्च आता है। इसलिए आजकल कार्ड लेवल इंजीनियरों की जगह कंप्यूटर निर्माण मेंटेनेंस असेम्बिलंग करने वाली कंपनियों चिप लेवल इंजीनियरों की भर्ती कर रही हैं। यही वजह है कि कंप्यूटर हार्डवेयर का कोर्स अत्यधिक रोजगारात्मक हो गया है।
पाठ्यक्रम
एक वर्ष के डिप्लोमा कोर्स के अंतर्गतर मदर बोर्ड, मॉनिटर, फ्लॉपी ड्राइव, सीडी ड्राइव, हार्ड डिस्क ड्राइव रिपयेरिंग एवं विंडोज एंट्री की ट्रेनिंग दी जाती है। बहुचर्चित कंप्यूटर संस्थान "-सेट" के अंतर्गत उपरोक्त सिलेबस के अतिरिक्त एसएमपीएस (पावर सप्लाई) एटीएक्स, मॉनिटर्स/बीजीए/कलर, मदर बोर्ड अपटू पेन्टियम, प्रिंटर (डॉट मैट्रिक्ज, कलर, लेजर), की-बोर्ड, माउस, डिस्प्ले कार्ड्स की शिक्षा दी जाती है। साथ ही लोकल एरिया नेटवर्किग (एलएएन) इंटरनेट की भी सूक्ष्मताओं से अवगत कराया जाता है।
शैक्षणिक योग्यता
चिप लेवल डिप्लोमा कोर्स करने के लिए 10वीं प्रथम श्रेणी या 10+2 किसी भी श्रेणी में उत्तीर्ण होना चाहिए। विज्ञान, कला, वाणिज्य सभी संकाय के छात्र प्रवेश ले सकते हैं।
वेतन
इस कोर्स को करने के बाद शुरूआती वेतन पांच से आठ हजार से शुरू होकर कुछ ही माह में अनुभवानुसार 30,000 रूपए तक आसानी से पहुंच जाता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों में वेतन की कोई सीमा नहीं है। बशर्ते योग्यता अनुभव हो।
रोजगार की संभावनाएं
इस कोर्स को करने के बाद कंप्यूटर निर्माण करने वाली कंपनियों, कंप्यूटर मरम्मत कार्य करने वाले केन्द्रों में नौकरी मिल सकती है। कोर्स के अंतिम चरण में छात्रों को साक्षात्कार की तैयारी करने एवं नौकरी खोजने के तौर तरीकों से भी अवगत कराया जाता है।
कोर्स कहां करें
हार्डवेयर शिक्षा देने वाले तमाम संस्थान है लेकिन अधिकांश (95 प्रतिशत) संस्थानों में कार्ड लेवेल ट्रेनिंग परंपरागत प्रकार से दी जाती है जबकि चिप लेवल वर्तमान समय में प्रासंगिक और अत्याधुनिक कोर्स

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Tuesday, December 16, 2008

समाज सेवा में भी हैं कैरियर बनाने की संभावनाएं भरपूर...

कार्यो को पूरा करने के लिए आज प्रशिक्षित सामाजिक कार्यकर्ताओं की मांग बढती जा रही है। यदि आप भी सोशल वर्क में ऑनर्स कर रहे हैं, तो इस कोर्स पर बेहतर पकड बनाने के लिए मेहनत और लगन के साथ तैयारी में जुट जाएं।

समझें पाठ्यक्रम के मसविदे को
इस कोर्स के अंतर्गत समाज सेवा सिद्धांत एवं प्रयोग, समाज का ढांचा, मानवीय वद्धि एवं व्यक्तित्तव विकास, सामाजिक समस्याएं, समाज सेवा की विधियों, समाज सेवा के क्षेत्र, समाजिक नीति एवं योजना, समाजिक विकास, संचार जैसे अनिवार्य विषयों के अलावा, कुछ वैकल्पिक विषय भी पढाए जाते हैं। इसके साथ-साथ सोशल वर्क के व्यावहारिक पहलुओं को सीखने के लिए सामाजिक कल्याण एवं विकास के क्षेत्र में कार्यरत एजेंसियों में स्टूडेंट्स को सप्ताह में दो अथवा तीन दिन के लिए फील्ड वर्क भी करना पडता है।
जरूरी है व्यावसायिक शैली
समाज सेवा के विद्यार्थियों के लिए यह जरूरी है कि वे क्लास रूम में इसके मूलभूत को प्राध्यापकों से जानें और समझें। साथ ही, इस विषय पर व्यवसायिक ढंग हासिल करने के लिए इन बातों पर भी अमल करें :
आत्मानुशासन का सख्ती से पालन करें।
समय प्रबंधन पर दें खास ध्यान।
दिशापूर्ण अथवा लक्ष्य केन्द्रित तरीके अपनाएं।
अभिव्यक्ति एवं लेखन क्षमता को उन्नत करें।
सीखें डॉक्यूमेंटेशन करना
सोशल वर्क में डॉक्यूमेंटेशन का विशेष महत्व है। इसमें डायग्राम्स, ग्राफ, टेबल्स एवं चार्टो का प्रयोग करते हुए लेखन कार्य करना होता है। लगातार अभ्यास से बहुत जल्द आप खुद में सुधार देखेंगे। हां, विषय संबंधी की-व‌र्ड्स को याद करना न भूलें।
करें आत्म-मूल्यांकन
इस पाठ्यक्रम के विद्यार्थियों को सामाजिक समस्याओं चाहे वे व्यक्तिगत स्तर पर हों, सामूहिक स्तर पर अथवा सामुदायिक स्तर पर, उनका समाधान करना पडता है। इसमें व्यक्तित्व एवं व्यवहार अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए अपने व्यवहार में सरलता और सहजता लाएं। व्यक्तित्व एवं व्यवहार संबंधी कमजोरियों को तत्काल दूर करने का प्रयास करें।
मैदानी अभ्यास नियमित करें
यह विषय समाज के विभिन्न पहलुओं से संबंधित है। इसके अंतर्गत संपूर्ण समाज एक प्रयोगशाला है। फील्ड प्रैक्टिस लर्निग के लिए सामाजिक संरचना, सामाजिक घटनाओं, मानवीय संबंधों, सामाजिक मनोविज्ञान को समझें।
अवलोकन व विश्‍लेषण
सोशल वर्क पाठ्यक्रम के अंतर्गत फील्ड वर्क के दौरान ऐसे अनेक अवसर आते हैं, जब विद्यार्थियों को कुछ न कुछ अवलोकन करना होता है। तर्कपूर्ण सोच का प्रयोग करते हुए अवलोकन किए गए बिंदुओं का विश्लेषण करें।
कार्यशालाओं में जाएं और ज्ञान पाएं
समकालीन सामाजिक समस्याओं एवं चुनौतियों तथा उनके समाधान के मॉडलों को समझने हेतु संगोष्ठियों एवं कार्यशालाओं में भागीदारी बेहतर मंच प्रदान करती हैं। इनमें सक्रिय रूप से भाग लेने से आप अपने विषय में रुचि लेंगे और उसे गहराई से समझेंगे।
किताबों से करें दोस्ती
समाज सेवा विषय के आधारभूत सिद्धांतों को समझने के लिए कुछ अच्छी किताबें हैं, जिनसे आपको इस विषय पर पकड बनाने में आसानी होगी। इनके नाम हैं:
ह्यूमन सोसाइटी-किंग्सले डेविस
द हैंड बुक ऑफ सोशल साइकोलॉजी (वॉल्यूम एक से पांच)
जी.लिन्डजी एवं ई.एंडरसन
इंटरनेशनल सोशल वर्क-एल.एम.हीली
मेथडोलॉजी ऑफ रिसर्च इन सोशल साइंसेज-ओ.आर.कृष्णास्वामी
सोशल वर्क एंड एम्पॉवरमेंट-राबर्ट एडम्स
कम्यूनिटी ऑर्गनाइजेशन इन इंडिया- एच.वाई.सिद्दीकी
मैगजींस एवं जर्नल्स
नवीनतम जानकारियों से खुद को जागरूक रखने के लिए विद्यार्थी इन पत्रिकाओं व जर्नल को देख सकते हैं:
योजना, कुरूक्षेत्र, सोशल वेलफेयर, इंडियन जर्नल्स ऑफ सोशल वर्क, कंटेम्पररी सोशल वर्क और सोशल वर्क रिव्यू
क्या करें, क्या न करें
प्रत्येक विषय अथवा अवधारणा को समझने के बाद ही आगे बढें।
नियमित रूप से पढने की आदत डालें और नोट्स बनाएं।
फील्ड वर्क करते समय पर्यवेक्षक के दिशा-निर्देशों का पालन करें।
जहां तक संभव हो केस स्टडीज जरूर पढें।
मैदानी काम को मौज मस्ती न समझें।

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Tuesday, December 9, 2008

समूह अध्ययन से बढ़ें आगे..भाग-दो

सफल अध्ययन समूह के बनाने के लिए उसके लक्ष्णों को जानना भी जरूरी हैं। इसके लिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि प्रत्येक सदस्य समूह चर्चा में भाग लेता हो। एक समय में एक ही समूह सदस्य को बोलना चाहिए। समूह के अन्य सदस्यों को उसकी बातों को बिना व्यवधान डाले सुनते हों।

यदि किसी सदस्य को कोई सवाल समझ में नहीं आ रहा है या वह कोई काम देता है, तो सभी सदस्य मिलकर उस सवाल का हल खोजने की कोशिश करें। सभी सदस्य अपने काम को करने के लिए तत्पर हों और कोई भी काम तेजी से करते हों।
समूह के सभी सदस्यों का दर्जा समान हो और वे एक-दूसरे का सम्मान करते हों। गु्रप के सभी सदस्यों को एक-दूसरे की आलोचना करने का अधिकार हो, लेकिन याद रखें, यह आलोचना व्यक्तिगत नहीं, बल्कि रचनात्मक होनी चाहिए। समूह के सदस्य एक-दूसरे से सवाल पूछने में सहज महसूस करें।
सकारात्मक नजरिए के साथ-साथ यह सोच हो- हम मिलकर यह काम कर सकते हैं।
अध्ययन समूह की सफलता के लिए इन बातों से बचना भी जरूरी होता है।
ध्यान रखें कि अध्ययन समूह अपने कार्यसूची और लक्ष्य से न भटके।
अध्ययन समूह समाजिक समूह में न बदल जाए।
बिना तैयारी के पढ़ाई के सत्र में कोई भी सदस्य भाग न ले।
सभी सदस्य ईमानदारी के साथ गु्रप को अपना योगदान दे।
समूह में नकारात्मक विचारों को जगह न दें।

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Monday, December 8, 2008

समूह अध्ययन से बढ़ें आगे-भाग-एक

राजेश क्षत्रिय मप्र लोक सेवा आयोग के की परीक्षा पास कर नौकरी में आए। क्षेत्रीय सहकारिता बैंक में प्रबंधक हैं। जब भी उनसे कोई पूछता है कि उनकी सफलता का राज क्या है, तो वे अपने छोटे से अध्ययन समूह का नाम लेना नहीं भूलते। जब वे कॉलेज में थे, तभी उन्होंने एक अध्ययन समूह बनाया था। आज उनके गुट के सभी लडके एक से बढकर एक जगह पर काम कर रहे हैं। दरअसल, अध्ययन समूह के बहुत से फायदे होते हैं। समूह मे अध्ययन से आपका समक्ष तो बढ़ती ही है, इससे आपको चर्चा एवं परीक्षा की तैयारी में भी सहायता मिलती है।
समूह अध्ययन से पढाई व तैयारी के दौरान सहयोग मिलता है। अगर किसी कारणवश पढाई के प्रति आपकी प्रेरणा में कमी आ जाती है, तो ऐसी स्थिति में गु्रप के अन्य सदस्य आपको प्रोत्साहित करते हैं।
बहुत से लोग क्लास में टीचर से सवाल पूछने में हिचकिचाते हैं। ऐसे विद्यार्थियों के लिए समूह अध्ययन बहुत फायदेमंद होता है। वे अपने अध्यययन समूह में आसानी से अपने सवाल पूछ सकते हैं।
अध्ययन समूह का हिस्सा बनने के बाद आपको अपने अध्ययन के प्रति और भी गंभीर होना होगा। इसका कारण यह है कि गु्रप के हर सदस्य की तैयारी दूसरे सदस्य की तैयारी पर निर्भर करेगी। अगर आप अच्छी तैयारी नहीं करेंगे, तो समूह के अन्य सदस्यों की पढाई पर इसका बुरा असर पडेगा।
समूह के सदस्य पढाई के दौरान नई जानकारियों और अवधारणाओं को सुनकर उन पर चर्चा भी करते हैं। इस तरह आपमें एक अच्छे श्रोता और वक्ता के गुणों का भी विकास होगा।
इतना ही नहीं, समूह के सदस्यों से आपको पढ़ाई के नए तौर तरीके भी मिल सकते है।
आप समूह के अन्य सदस्यों के कक्षाओं मे बनाए गए नोट्स की तुलना कर सकते हैं। ऐसी चीजें, जो क्लास में नोट करने से रह गई हों, उन्हें पूरा कर सकते हैं।
दूसरे, समूह सदस्यों से कुछ ऐसी जानकारियां भी मिल सकती हैं, जो आपकी किताब में न हो या आपके टीचर ने आपको न बताया हो! इस तरह से आपकी जानकारी में वृद्धि हो सकती है।
कभी-कभी पढाई काफी नीरस हो जाती है। ऐसी स्थिति में आप समूह सदस्यों के अध्यययन को मजेदार बना सकते हैं।
कैसे शुरू करें समूह अध्ययन
अध्ययन समूह बनाना आसान काम नहीं है। राहुल और उसके दोस्तों ने ऐसा ही एक समूह बनाने की सोची, लेकिन कुछ ही दिनों में उन्हें लगा कि उनका अध्ययन समूह पढ़ाई करने की बजाय गप्पे लडाने में ज्यादा रुचि लेने लगा है। कहीं आपका समूह भी ऐसा न करने लगे, इसलिए किसी को भी अपने समूह में शामिल करने से यदि आपको निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर हां में मिले, तभी उसे अपने समूह में शामिल करें :
क्या उसमें पढने की लगन है?
क्या उसमें विषयों की समझ है?
क्या उस पर भरोसा किया जा सकता है?
क्या वह दूसरों के विचारों का सम्मान करता है?
क्या आपको उसका व्यवहार पसंद है?
अगर आपको सभी सवालों के उत्तर हां में मिलते हैं, तो अपने मित्र या सहपाठी को समूह में शामिल कर सकते हैं। इस तरह तीन से पांच लोगों को इकट्ठा कर एक अध्ययन समूह बना सकते हैं। ध्यान रहे, अध्ययन समूह में इससे ज्यादा लोगों को शामिल नहीं करना चाहिए।
समूह के साथ मिलकर तय कीजिए कि आपका अध्ययन का दौर कितना लंबा हो! सप्ताह में दो या तीन बार मिलना ठीक होता है। अध्ययन सत्र 60-90 मिनट का होना चाहिए।
पढा़ई का स्थान घर या कॉलेज के पास हो, जहां आसानी से पहुंचा जा सके। ऐसी जगह हो जहां भीड और शोर-शराबा न हो। इसके लिए कोई खाली क्लासरूम बेहतर होगा।
अपने अध्ययन समूह का लक्ष्य तय कीजिए। आपका लक्ष्य, नोट्स अद्यतन करना या उनकी तुलना करना, विमर्श, पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी हो सकता है।
अपने अध्ययन सत्र की कार्यसूची तय कीजिए तथा यह भी तय कीजिए कि उस सत्र में प्रत्येक समूह सदस्य को क्या कार्य करने हैं!

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Saturday, December 6, 2008

इग्नू की पहुंच -भाग-दो

वर्ष 1985 में संसदीय अधिनियम द्वारा स्थापित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय ने मात्र दो दशकों में दुनिया के सबसे बडे विश्वविद्यालय के रूप में अपनी पहचान बना ली है। 1987 से इसने शैक्षिक कार्यक्रम चलाने आरंभ किए। सबसे पहले प्रबंध में डिप्लोमा एवं दूर शिक्षा में डिप्लोमा कार्यक्रम शुरू किए गए। आज यह विश्वविद्यालय 21 अध्ययन विद्यापीठों, 58 क्षेत्रीय केंद्रों, 1804 अध्ययन केंद्रों-दूर अध्ययन केंद्रों तथा विदेशों में स्थित 46 केंद्रों के नेटवर्क के माध्यम से भारत सहित विश्व के 32 देशों में लगभग 18 लाख स्टूडेंट्स की शैक्षिक आवश्यकताओं को पूरा कर रहा है। वर्तमान समय में इग्नू के 138 सर्टिफिकेट, डिप्लोमा, डिग्री पीएचडी प्रोग्राम्स के तहत करीब 1300 कोर्स संचालित हैं।

बढ रही हैं उपलब्धियां
उल्लेखनीय है कि आज देश के उच्च शिक्षा में नामांकित कुल छात्रों में से लगभग 13 प्रतिशत (डिस्टेंस एजुकेशन में कुल स्टूडेंट्स का 50 प्रतिशत से अधिक) की शैक्षिक आवश्यकताएं इग्नू पूरी कर रहा है। डिस्टेंस एजुकेशन में अग्रणी संस्थान के रूप में इसे कनाडा स्थित कॉमनवेल्थ ऑफ लर्निग (सीओएल) ने 1993 में डिस्टेंस एजुकेशन के क्षेत्र में सर्वोत्तम केंद्र के रूप में सम्मानित किया। इसके अतिरिक्त इसे 1999 में डिस्टेंस एजुकेशन के क्षेत्र में सर्वोत्तम सामग्री का पुरस्कार भी मिला।
खास बात यह भी है कि केवल एजुकेशन के लिए समर्पित देश के विशेष उपग्रह एडुसैट के 20 सितंबर, 2004 को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किए जाने तथा अंतर-विश्वविद्यालय कंसोर्टियम की स्थापना से इग्नू ने भारत को टेक्नोलॉजी समर्थ शिक्षा के नए युग में प्रवेश करा दिया है। आज इग्नू के पास 134 दो-तरफा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सेंटर हैं। साथ ही, सभी क्षेत्रीय अध्ययन केंद्रों को एडुसैट से जोडा गया है, ताकि सैटेलाइट के माध्यम से दूर-दराज के विद्यार्थियों तक शिक्षा का आदान-प्रदान किया जा सके। इग्नू में वर्ष 2005 में परिसर रोजगार सहायक प्रकोष्ठ (सीपीसी) की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य अपने विद्यार्थियों को उनके अनुकूल जॉब दिलाने में सहायता देना है।
वरदान बना ओपेन लर्निग
डिस्टेंस एजुकेशन पढाई का ऐसा माध्यम है, जिसमें टीचर और स्टूडेंट्स अलग-अलग स्थानों पर होते हैं। टेली-कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए किसी एक जगह पढा रहे टीचर से देश के अलग-अलग व सुदूरवर्ती क्षेत्रों में बैठे स्टूडेंट्स पढ सकते हैं और उनसे सवाल पूछकर अपनी उत्सुकता शांत कर सकते हैं। खास बात यह है कि स्टूडेंट्स क्लासरूम में लगी बडी स्क्रीन पर टीचर को पढाते हुए भी देखते हैं। इससे उन्हें ऐसा नहीं लगता कि वे बिना टीचर के पढाई कर रहे हैं।
स्टूडेंट्स को कोर्स पर आधारित पर्याप्त स्टडी मैटीरियल भी उपलब्ध कराया जाता है। ताकि वे रेगुलर पढाई कर सकें। समय-समय पर एग्जाम होता है और फाइनल एग्जाम क्वालिफाई करने के बाद उन्हें रेगुलर कोर्सो की भांति मान्यता प्राप्त प्रमाण पत्र प्रदान किया जाता है, जिसके आधार पर वे सरकारी और निजी या फिर विदेश में कहीं भी अपने अनुकूल जॉब पा सकते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे कोर्स बेहद कम फीस में और अपने आस-पास स्थित स्टडी सेंटर से ही किए जा सकते हैं। ऐसे कोर्स उच्च शिक्षा के क्षेत्र में उपलब्ध हैं और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त हैं।
उच्च शिक्षा हासिल करने वाले स्टूडेंट्स की लगातार बढती संख्या को देखते हुए डिस्टेंस लर्निग से शिक्षा प्रदान करने वाले ऐसे संस्थान तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। इस माध्यम के उपलब्ध हो जाने से उन स्टूडेंट्स को काफी लाभ हो रहा है, जिन्हें महानगरों या बडे शहरों में न जा पाने के कारण उच्च शिक्षा से वंचित रहना पडता था। ये कोर्स ग्रामीण और सुदूरवर्ती क्षेत्रों के युवाओं के लिए बेहद उपयोगी हैं। इन कोर्सो की लोकप्रियता को देखते हुए आज भारत में इग्नू के अलावा दस अन्य विश्वविद्यालय भी डिस्टेंस एजुकेशन से तमाम कोर्स उपलब्ध करा रहे हैं। इन विश्वविद्यालयों के अलावा देश भर में आज 54 से अधिक डिस्टेंस लर्निग इंस्टीटयूट भी हायर एजुकेशन की जरूरत को पूरा कर रहे हैं।
इग्नू के प्रमुख कोर्स
कम्प्यूटर ऐंड लाइब्रेरी ऐंड इन्फॉर्मेशन साइंसेज : इसमें मास्टर ऑफ कम्प्यूटर अप्लीकेशंस, बैचलर ऑफ कम्प्यूटर अप्लीकेशंस, पीजी डिप्लोमा इन लाइब्रेरी ऑटोमेशन ऐंट नेटवर्किग आदि शामिल हैं।
जर्नलिज्म, कम्युनिकेशन ऐंड क्रिएटिव राइटिंग : इसके तहत पीजी डिप्लोमा इन ट्रांसलेशन, जर्नलिज्म ऐंड मास कम्युनिकेशन, ऑडियो प्रोग्राम प्रॉडक्शन, रेडियो प्रसारण, डिप्लोमा इन क्रिएटिव राइटिंग इन इंग्लिश आदि शामिल हैं।
इंजीनियरिंग ऐंड रूरल डेवलॅपमेंट :
इस प्रोग्राम के अंतर्गत बीटेक-सिविल (कॅन्स्ट्रक्शन मैनेजमेंट), वाटर रिसोर्स इंजीनियरिंग, मैकेनिकल इंजीनियरिंग, पीजी डिप्लोमा इन रूरल डेवलॅपमेंट, एडवांस डिप्लोमा इन वाटर रिसोर्स।
एरिया स्फेसिफिक अवेयरनेस ऐंड मैनपॉवर डेवलॅपमेंट प्रोग्राम्स : इस प्रोग्राम के तहत शामिल विषय बेहद महत्वपूर्ण हैं। इनमें शामिल विषयों के नाम हैं-पीजी डिप्लोमा इन डिजास्टर मैनेजमेंट, इनवॉयरमेंट ऐंड सस्टेनेबल डेवलॅपमेंट, डिप्लोमा इन वैल्यू एडेड प्रॉडक्ट फ्रॉम फ्रूट्स ऐंड वेजिटेबल्स, पल्सेज ऐंड ऑयलसीड्स, मीट टेक्नोलॉजी आदि हैं। पता : इंदिरा गांधी नेशनल ओपेन यूनिवर्सिटी (1985), मैदान गढी, नई दिल्ली,फोन : 91-11-29532321, 29535062-65,
ई-मेल rmohan@ignou.ac.in,
वेबसाइट www.ignou.ac.in
टेक्नोलॉजी से पॉपुलर हुए कोर्स
इग्नू के कोर्स आज के समय के अनुसार कितने अपडेटेड हैं?
इग्नू डिस्टेंस ओपेन लर्निग के माध्यम से उच्च और वोकेशनल शिक्षा प्रदान करने वाला देश का सबसे बडा संस्थान है। इसकी सबसे बडी चुनौती देश के दूर-दराज के उन इलाकों तक उपयोगी शिक्षा का प्रसार करना है, जहां के लोग शहर जाकर पढाई नहीं कर सकते। इसके लिए हमने सैटेलाइट की मदद ली है। हमारी कोशिशों से इसरो ने इसी उद्देश्य से एडुसैट का प्रक्षेपण किया था। इसके अलावा, अब हम कम्युनिटी रेडियो, कम्युनिटी कॉलेज और अब मोबाइल एजुकेशन जैसे माध्यमों का भी इस्तेमाल कर रहे हैं।
शिक्षा में मोबाइल का उपयोग कैसे हो रहा है?
चूंकि अब मोबाइल का प्रसार गांव-गांव तक हो गया है, ऐसे में हमने मोबाइल फोन के माध्यम से स्टडी मैटीरियर प्रोवाइड करने और ऑन-डिमांड ऑब्जेक्टिव टेस्ट लेने की व्यवस्था शुरू की है। ऑन-डिमांड का मतलब है-किसी कोर्स का स्टूडेंट जब यह सूचना देगा कि वह अब परीक्षा देने के लिए तैयार है, तभी उसका टेस्ट होगा।
टेक्नोलॉजी का और किस तरह प्रयोग हो रहा है?
हम गांव-गांव में उपलब्ध एसटीडी बूथ के माध्यम से टेली सेंटर/विलेज नॉलेज सेंटर मैनेजमेंट कोर्स शुरू कर रहे हैं। इसके तहत बूथ चलाने वाले व्यक्ति को ट्रेनिंग देकर डिप्लोमा प्रदान किया जाएगा। यह ट्रेंड व्यक्ति गांव के लोगों को कॉल सेंटर, टेलीकम्युनिकेशन ट्रेनिंग देगा, ताकि वे टेलीकॉम इंडस्ट्री में बेहतर जॉब पा सकें। इसके लिए इग्नू टेलीसेंटरडॉटओआरजी के साथ टाई-अप कर रहा है। इस प्रोग्राम के तहत एक लाख से अधिक टेलीसेंटर्स व विलेज नॉलेज सेंटर्स मैनेजर्स बनाना है।

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Friday, December 5, 2008

कामकाजी प्रशिक्षण के बेहतर अवसर मुहैया कराता है इग्नू...

रवि शंकर विश्वकर्मा मप्र के बुंदेलखण्ड के एक सुदूर गांव में रहते हैं और संयुक्त परिवार के सदस्य हैं। खेती-बाडी और बढईगिरी से गुजारा करने वाले उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। किसी तरह उन्होंने बारहवीं तक की पढाई की। वह कोई कामकाजी प्रशिक्षण लेकर खुद का कोई उद्यम आरंभ करना चाहते थे, लेकिन उनके आस-पास ऐसी सुविधा नहीं थी।

जब उन्होने अपने मन के इस दर्द को शहर में रहने वाले अपने बचपन के एक मित्र से व्यक्त किया, तो उन्होंने इग्नू से संपर्क करने का सुझाव दिया। संयोग से इग्नू में उनकी रुचि का बढ़ईगिरी प्रशिक्षण का सर्टिफिकेट पाठ्यक्रम मौजूद था और वह भी नाममात्र के शुल्क पर। खास बात यह है कि उन्हें इसके लिए कहीं जाना भी नहीं था। उन्हें गांव की पंचायत के टीवी, अपने रेडियो और मोबाइल फोन के माध्यम से ही बढ़ईगिरी का व्यावसायिक प्रशिक्षण मिल गया। इस कोर्स को करने के बाद उन्होंने स्थानीय बैंक से लोन लेकर गांव में ही फर्नीचर की एक दुकान खोल ली। कुछ ही वर्षो में उनकी दुकान चल निकली और उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों को इससे जोडने के अलावा कुछ और लोगों को भी नौकरी पर रख लिया। इग्नू के ऐसे अनगिनत कोर्स हैं, जिनकी मदद से शहरों के साथ-साथ गांव-देहात तक के साधनहीन लोगों को न केवल जागरूक बनाया जा रहा है, बल्कि अल्पकालीन प्रशिक्षण देकर उन्हें उद्यमी बनने के लिए भी प्रोत्साहित किया जा रहा है। दरअसल, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय यानी इग्नू न केवल मुक्त व दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से शहरी से लेकर दूर-दराज तक के लोगों को उच्च शिक्षा के साथ-साथ प्रोफेशनल शिक्षा प्रदान कर रहा है, बल्कि दुनिया की नई-नई तकनीकों व जानकारियों से भी लोगों को लगातार जागरूक कर रहा है। इग्नू उच्च शिक्षा प्राप्त करने की आकांक्षा रखने वाले उन सभी लोगों के लिए एक वरदान की तरह है, जो किसी कारण नियमित पढाई नहीं कर पाते। इस संस्थान में आज के हिसाब से लगभग सभी कोर्स उपलब्ध हैं और खास बात यह है कि इनकी विश्वसनीयता नियमित संस्थानों द्वारा दी जा रही शिक्षा से किसी मायने में कम नहीं है। इग्नू द्वारा संचालित अधिकांश कोर्सो में वर्ष में दो बार एडमिशन होते हैं।

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Wednesday, December 3, 2008

कम्यूटर साईंस की पढ़ाई मे प्रोग्रामिंग का ज्ञान भी जरूरी....

कम्प्यूटर साइंस कोर्स में आपको केवल कम्प्यूटर्स के बारे में ही नहीं पढना होता है, बल्कि मैथमेटिक्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, इकोनॉमिक्स व कॉमर्स भी इस विषय के अभिन्न अंग हैं। यही कारण है कि प्लानिंग और स्ट्रेटेजी के साथ अपनी तैयारी शुरू करके ही आप इस कोर्स में अपनी राह आसान बना सकते हैं।

सिलेबस के कंट्रोल पैनल
मैथमेटिक्स
कम्प्यूटर साइंस का महत्वपूर्ण आधार विषय है-मैथमेटिक्स। इसके डिफ्रेंशियल इक्वेशंस, कैलकुलस, प्रॉबेबिलिटी जैसे टॉपिक्स पर आप लगातार अभ्यास से अच्छी पकड बना सकते हैं। इसके लिए इन बातों पर विशेष रूप से गौर करें :
एक्सरसाइज सॉल्व करने के लिए जो गाइडलाइंस निर्धारित हैं, उनके मुताबिक ही हर सेक्शन और टॉपिक का अभ्यास करें।

इलेक्ट्रॉनिक्स
इलेक्ट्रॉनिक्स के सेक्शन में डिजिटल सर्किट्स और इक्विपमेंट्स को समझें। इससे प्रैक्टिकल करने में आसानी होगी। इसके साथ ही, निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें :
फंडामेंटल्स पर पकड बनाएं।
कॉन्सेप्ट्स और सर्किट को समझने के लिए अधिक से अधिक समय दें।
एक से अधिक रेफरेंस बुक्स से कंसल्ट करें।

कम्प्यूटर्स
कम्प्यूटर साइंस में कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग के पेपर्स सबसे महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, स्टूडेंट्स को ऑपरेटिंग सिस्टम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, नेटवर्किग आदि को भी विस्तार से पढना होता है। इस सेक्शन के लिए विद्यार्थी इन बातों पर विशेष ध्यान दें :
प्रोग्रामिंग फंडामेंटल्स को रटें नहीं, समझें।
प्रोग्रामिंग के हर पेपर के साथ प्रैक्टिकल पेपर भी जरूर होता है। प्रोग्रामिंग लॉजिक को समझने के लिए यह इम्पॉर्टेट की है, इसलिए प्रैक्टिकल्स पर ज्यादा ध्यान दें।
प्रोग्रामिंग की हर रोज दो घंटा प्रैक्टि्स करें।

इकोनॉमिक्स व कॉमर्स

इस सेक्शन के लिए आप इकोनॉमिक्स व कॉमर्स के अंतर्गत आने वाले विषय क्षेत्रों, जैसे- डिमांड- सप्लाई, कारोबार, कस्टमर रिलेशंस आदि को ध्यान से समझें। आईटी और कॉमर्स के रिलेशनशिप को जानें। तथा इन बातों पर भी अमल करें :

नोट्स बनाएं।
कॉमर्स की मैगजीन्स व अखबार जरूर पढें।

प्रोग्रामिंग है सीएस की हार्ड डिस्क अधिकतर स्टूडेंट्स प्रोग्रामिंग से घबराते हैं। वैसे, प्रोग्रामिंग इतनी भी मुश्किल नहीं होती कि उसे समझा न जा सके। बस, कुछ बातों पर ध्यान दें, जैसे :

सबसे पहले प्रोग्रामिंग स्ट्रक्चर्स को समझें।
प्रोग्रामिंग की प्रैक्टिस करते समय शुरुआत छोटी-छोटी प्रॉब्लम्स से करें।
प्रॉब्लम को कागज पर पहले मैनुअली सॉल्व कर लें। इसके बाद इससे संबंधित सभी स्टेप्स को सिक्वेंस में आसान लैंग्वेज में लिखकर एल्गोरिथम बना लें।

एल्गोरिथम बनाने के बाद हर स्टेप को प्रोग्राम में कन्वर्ट करें।
प्रोग्राम को ड्राई रन करके देखें और लॉजिकल एरर्स को ठीक करें।
अब प्रोग्राम को कम्प्यूटर पर रन करें।

प्रोग्रामिंग एरर्स को समझने के लिए लैब मैनुअल का प्रयोग करना आवश्यक है।
बुक्स करें लॉग-ऑन कम्प्यूटर साइंस पर कुछ अच्छी किताबों के नाम इस प्रकार हैं :

द कम्पलीट रेफरेंस जावा : 2-नॉटन ऐंड शील्ड
द कम्पलीट रेफरेंस सी++ : एच. शील्ड
डाटा स्ट्रक्चर्स, ऐप्लिकेशंस इन सी++ : क्रुस
फंडामेंटल्स ऑफ डाटा स्ट्रक्चर्स : हॉरोविज
कम्प्यूटर सिस्टम आर्किटेक्चर : मॉरिस मानो

डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स : मॉरिस मानो
कम्प्यूटर ऑर्गनाइजेशन ऐंड ऑर्किटेक्चर : डब्ल्यू स्टॉलिंग्स
कम्प्यूटर अलगोरिथम्स : कॉरमन
प्रोग्रामिंग विद सी++ऐंड डाटा स्ट्रक्चर्स : मारिया लिटविन ऐंड गैरी लिटविन

नेट से लें बेस्ट
गूगल सर्च इंजन तो आपके लिए बेहतर साबित होगा ही, इसके अलावा आप विकी-पीडिया की साइट पर जाकर भी बहुत-सी जानकारियां हासिल कर सकते हैं।

मैगजीन्स से भी लें ज्ञान
विषय के प्रति रुचि पैदा करने और नवीनतम जानकारियों के लिए इस विषय पर कुछ अच्छी मैगजीन्स हैं :
डिजिट, इलेक्ट्रॉनिक्स फॉर यू, पीसी क्वेस्ट, साइंस रिपोर्टर, साइबर व‌र्ल्ड और कम्प्यूटर्स

क्या करें, क्या न करें
जब तक एक टॉपिक क्लियर न हो, तब तक अगले टॉपिक की ओर बढने से बचें।

असाइनमेंट्स बनाएं। कम्प्यूटर एवं इलेक्ट्रॉनिक्स से संबंधित सेमिनार व वर्कशॉप जरूर अटेंड करें।
प्रैक्टिकल करने से कभी जी न चुराएं।

बातें छोटी मगर काम की
प्रोग्रामिंग के प्रश्नों में प्रोग्राम की हर इंस्ट्रक्शन, लूप, वैरिएबल्स के लिए कमेंट लिखना जरूरी है।
इलेक्ट्रॉनिक्स के प्रश्नों में क्लियर सर्किट्स बनाकर उनकी वर्किग समझाएं।
एरर्स बताने वाले प्रश्नों में इंस्ट्रक्शंस लिखकर एरर बताएं।
आउटपुट वाले प्रश्नों का उत्तर लिखते समय प्रॉपर सिक्वेंस का ध्यान रखें।

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