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Tuesday, February 16, 2010

आर्थिक विषमता के कारण अपराध बढ़ते हैं - जस्टिस धर्माधिकारी,

 'अपराध-विवेचना एवं सामाजिक जागरूकता'' व्याख्यान का आयोजन
गांधीवादी विचारक डॉ. एस.एन. सुब्बाराव ने कहा है कि सज्जनों की निष्क्रियता और दुर्जनों की सक्रियता जैसी दो बुराईयां समाज में विद्यमान हैं, इसी वजह से अपराधवृत्ति समाप्त नहीं हो रही है। अच्छे लोग यदि सक्रिय हो जायें तो किसी हद तक अपराधों पर अंकुश लग सकता है। 

डॉ. सुब्बाराव ने यह बात आज यहां ''अपराध-विवेचना एवं सामाजिक जागरूकता'' विषय पर अपने व्याख्यान में कही। म.प्र. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा बसंत व्याख्यानमाला के तहत ''मंथन'' कार्यक्रम में इस व्याख्यान का आयोजन किया गया। 
कार्यक्रम में म.प्र. मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष श्री जस्टिस डी.एम. धर्माधिकारी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। श्री धर्माधिकारी ने डॉ. एस.एन. सुब्बाराव को शाल, श्रीफल, प्रशस्ति पत्र और सम्मान निधि प्रदान कर वीरेन्द्र तिवारी सम्मान से सम्मानित किया। इस अवसर पर डॉ. रमेश दवे, प्रो. आशा शुक्ला और हिन्दी भवन के सचिव श्री कैलाशचंद्र पंत विशेष रूप से उपस्थित थे।

डॉ. सुब्बाराव ने कहा कि अपराधमुक्त समाज के लिये पुलिस और अच्छे लोगों के बीच समन्वय आवश्यक है। समाज जितना अधिक जिम्मेदार होगा सरकार और पुलिस पर काम का बोझ उतना ही कम होगा। श्री सुब्बाराव ने कहा कि बापू ने सर्वप्रथम देश की एकता को कायम रखने का संदेश दिया था, इसलिये हमें क्षेत्रीयता और भाषायी संकीर्णताओं से ऊपर उठकर अपने वैविध्यपूर्ण सांस्कृतिक स्वरूप को बनाये रखने के लिये सामूहिक प्रयास करने होंगे।
उन्होंने कहा कि भाषाओं के आधार पर देश को कमजोर करना घातक होगा। इसलिये हिन्दी के प्रसार के साथ ही क्षेत्रीय भाषाओं को भी समान रूप से बढ़ने के अवसर मिलने चाहिये। श्री सुब्बाराव ने कहा कि अच्छा शहर वही होता है जहां पुलिस की कम से कम जरूरत पड़े। लेकिन विडंबना है कि चौराहों पर लाल बत्ती जलते रहने के बावजूद भी यातायात पर नियंत्रण के लिये 4-5 पुलिस कर्मियों का एक समूह खड़ा रहता है। 
जिस दिन लोग स्वेच्छा से नियमों का पालन करेंगे, उस दिन अपराधवृत्ति कम हो जायेगी। श्री सुब्बाराव ने कहा कि पाप से घृणा होनी चाहिये, पापी से नहीं। उन्होंने कार्यक्रम में बागियों के समर्पण से जुड़े अपने मार्मिक संस्मरण सुनाए।

जस्टिस धर्माधिकारी ने कहा कि निष्पक्ष न्यायदान के लिये समाज को सक्रिय होकर पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को सहयोग करना होगा। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी, संत विनोबा भावे और श्री सुब्बाराव कर्मयोगी हैं। इन महापुरुषों ने समाज में मानसिकता बदलने के प्रयास किये हैं। 
श्री धर्माधिकारी ने कहा कि बेहतर विवेचना और सच्ची गवाही से निष्पक्ष न्याय मिलता है। उन्होंने कहा कि हिंसा के प्रयोग से हिंसा को ही बढ़ावा मिलता है इसलिये अब अहिंसा को अपनाना आवश्यक है। अपराधवृत्ति बढ़ने के पीछे आर्थिक विषमता भी महत्वपूर्ण कारक है। श्री धर्माधिकारी ने कहा कि नक्सलवाद जैसी समस्याएं सर्वहारा वर्ग के शोषण के कारण ही पैदा हुई हैं। इसलिये बड़ी समस्याओं के कारण तलाश करके उनके निदान के प्रयत्न किये जाने चाहिये। 
श्री धर्माधिकारी ने कहा कि सामुदायिक पुलिसिंग योजना में अच्छे लोगों को पुलिस की मदद करने, परिवार परामर्श केन्द्रों के माध्यम से परिवारों को टूटने से बचाने आदि जैसे काम करके पुलिस की बड़ी मदद की जा सकती है। उन्होंने कहा कि म.प्र. मानव अधिकार आयोग ने आपराधिक घटनाओं से पीड़ितों की मदद के लिये शासन को सुझाव देकर एक विक्टिमोलॉजी प्रोजेक्ट मंजूर करवाया है। 
इसके तहत जिला स्तर पर सलाहकार समितियां गठित की गई हैं। इस प्रोजेक्ट के तहत पीड़ितों को वित्तीय, विधिक, चिकित्सकीय और उनके सामाजिक पुनर्वास जैसी सहायता उपलब्ध कराना संभव हो सका है। उन्होंने कहा कि हमारे देश की न्याय प्रणाली में कितना भी गंभीर अपराधी क्यों न हो उसका पक्ष सुनकर तथा ट्रायल करने के बाद ही सजा देने का प्रावधान है। भीड़ तंत्र के न्याय की व्यवस्था हमारे देश में नहीं है।

समाजशास्त्री श्रीमती आशा शुक्ला ने कहा कि सुविधाभोगी जीवनशैली अपराधवृत्ति को बढ़ाती है। मानव अधिकार, फारेंसिक साइंस, शिक्षाविद्, पुलिस और समाजशास्त्रियों को एकजुट होकर उन कारणों को खोजना होगा जिससे समाज में अपराधवृत्ति को बढ़ावा मिलता है। उन्होंने कहा कि आम जनता तो दूर की बात है प्रबुद्ध वर्ग के लोग भी फारेंसिक तकनीकियों के बारे में कुछ खास नहीं जानते हैं।
आपराधिक घटना में पीड़ित की मदद करने की हड़बड़ी में वे घटनास्थल पर उपलब्ध साक्ष्यों को ही नष्ट कर डालते हैं। श्रीमती शुक्ला ने कहा कि साइबर क्राइम बड़ी तेजी से बढ़ रहे हैं। संसार में पोर्न उद्योग का कारोबार 54 बिलियन डालर का हो गया है। 
ऐसे वातावरण में चंद फारेंसिक विशेषज्ञों और पुलिस के विवेचना दलों से यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि इतने बड़े पैमाने के अपराध क्षेत्र पर नियंत्रण रखा जाये। उन्होंने कहा कि यह सही है कि पुलिस का दायित्व समाज को सुरक्षा देना है, लेकिन समाज कितनी मदद पुलिस को करता है इस पर भी विचार करना होगा।

प्रो. रमेश दवे ने कहा कि श्री एस.एन. सुब्बाराव शांति के दूत हैं। उन्होंने अपने जीवनकाल में तीन पीढ़ियों के साथ काम किया है। उनका लक्ष्य देश में एकता को कायम करना है। उनमें युवा और वृद्ध को साथ लेकर चलने का सार्मथ्य है। 
श्री दवे ने कहा कि आज के इस कार्यक्रम में उत्तरपूर्वी राज्यों के नेहरू युवा केन्द्र के विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित हुए हैं, इससे यह बात स्पष्ट होती है कि डॉ. एस.एन. सुब्बाराव के गांधीवादी चिंतन का प्रभाव समाज के सभी वर्गों पर समान रूप से है। कार्यक्रम के अंत में आभार प्रदर्शन श्री कैलाशचंद्र पंत ने किया।

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