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Friday, February 6, 2009

कंम्प्यूटर भी सोच पाएंगें हमारे आपके जैसे....

इंसानी दिमाग दुनिया की सबसे जटिल संरचना है, इसीलिए दुनिया की सबसे बड़ी कंप्यूटर कंपनी आईबीएम अमेरिकी सरकार के साथ मिलकर एक ऐसा इलेक्ट्रॉनिक सर्किट बना रही है जो हमारे दिमाग की नकल कर सके। यह रिसर्च 'कॉग्निटिव कंप्यूटिंग' का एक हिस्सा है। विज्ञान की इस आधुनिक शाखा में दिमाग की संरचना को समझकर उसकी क्षमताओं का नकल करने की कोशिश की जाती है।

इस रिसर्च के तहत न्यूरोबायॉलॉजिस्ट, कंप्यूटर और मैटीरियल साइंटिस्ट और सायकॉलजिस्ट मिलकर काम करेंगे। इस प्रॉजेक्ट के पहले चरण के लिए अमेरिका डिफेंस एजंसी डारपा ने 49 लाख डॉलर की ग्रांट दी है। इस तकनीक के इस्तेमाल से कंप्यूटर भारी-भरकम आंकड़ों का अनैलिसिस, निर्णय लेने यहां तक कि इमिज़ पहचानने में सक्षम हो सकेंगे।
इस साझा प्रॉजेक्ट की अगुआई करने वाले और आईबीएम के वैज्ञानिक धर्मेंद्र मोढ़ा का कहना है, दिमाग में अलग-अलग अनुभवों में तालमेल बैठाने की अनोखी क्षमता होती है। वह इनसे मिली जानकारी के आधार पर बड़ी आसानी से देश, काल और चीजों के संबंधों को समझ लेता है। अभी तक बना कोई भी कंप्यूटर इस तरह की काबिलियत के एक छोटे हिस्से को भी नहीं पा सका है। इस प्रॉजेक्ट का मकसद दिमाग की कार्यशैली को समझकर उसके आधार पर दिमाग जैसा कंप्यूटर बनाना है।
इसके लिए आईबीएम दुनिया की पांच यूनिवर्सिटीज के साथ मिलकर काम करेगी। इसमें बायॉलॉजिकल सिस्टम की समझ के आधार पर न्यूरॉन के मॉडलों को सुपरकंप्यूटर द्वारा तैयार किया जाएगा। फिर, यह टीम ऐसा इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम बनाएगी जो इस मॉडल की तरह काम कर सके। इस प्रॉजेक्ट का आखिरी मकसद है एक ऐसा सिस्टम डिवेलप करना जो किसी बिल्ली के दिमाग जितना जटिल हो।
न्यूरोसाइंटिस्ट कम जटिल दिमाग वाले जानवरों के साथ प्रयोग करके जान गए हैं कि न्यूरॉन्स और उनको जोड़ने वाले सिनेप्सिस कैसे काम करते हैं। दूसरे शब्दों में, उन्होंने दिमाग की वायरिंग तैयार कर ली है। अब इस जानकारी के इस्तेमाल से सुपरकंप्यूटर बिल्ली जैसे जटिल दिमाग वाले जानवरों के दिमाग की नकल बनाने की कोशिश करेगा।
यह कोशिश आर्टिफिशल इंटेलिजंस से एकदम अलग है। आर्टिफिशल इंटेलिजंस में कंप्यूटर पहले एक मकसद सामने रखता है, फिर उसे हल करता है। लेकिन कॉग्नेटिव कंप्यूटिंग में दिमाग द्वारा समस्याएं सुलझाने के तरीके को अहमियत दी जाती है। एक इंसानी दिमाग अपनी इसी क्षमता की बदौलत न्यूरॉनों के आपसी संबंध में रद्दोबदल करता है और अनुभवों से नई चीजें सीखता है। इस तरह से उसकी क्षमताएं अपार हो जाती हैं। जब कंप्यूटर में इस तरह की काबिलियत आ जाएगी तो वह सही मायनों में सोच सकेगा।

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